भगवान

ईश्वर सब कुछ पवित्र कर देता है यह एक गहरा आध्यात्मिक सत्य है। मनुष्य के भीतर मौजूद लालच, लोभ, मोह, काम और क्रोध सामान्यतः पतन के कारण माने जाते हैं, लेकिन जब यही भाव ईश्वर की ओर मुड़ जाते हैं, तो वही मुक्ति का मार्ग बन जाते हैं। वस्तु नहीं बदलती, केवल उसकी दिशा बदलती है और परिणाम पूरी तरह बदल जाता है।

मनुष्य का मन हमेशा किसी न किसी में लगा रहता है। यदि यह संसार में लगेगा तो बंधन बनेगा, और यदि ईश्वर में लगेगा तो वही भक्ति बन जाएगा। इसलिए संतों ने कहा है कि विकारों को दबाने की नहीं, बल्कि ईश्वर की ओर मोड़ने की आवश्यकता है

गीता का सिद्धांत

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्

अर्थात जो जिस भाव से मुझे भजता है, मैं उसे उसी प्रकार स्वीकार करता हूँ

यहाँ स्पष्ट है कि भाव चाहे जैसा भी हो, यदि वह ईश्वर की ओर है तो अंततः कल्याण ही करता है। गीता यह भी सिखाती है कि मनुष्य अपने स्वभाव से ही कर्म करता है, इसलिए उसे अपने स्वभाव को दबाने के बजाय उसे उच्च दिशा देनी चाहिए

रामचरितमानस का उदाहरण

रामचरितमानस में तुलसीदास जी कहते हैं

जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी

अर्थात मनुष्य जिस भाव से भगवान को देखता है, भगवान उसे उसी रूप में मिलते हैं

रावण और कंस इसका बड़ा उदाहरण हैं। उन्होंने भगवान से द्वेष और क्रोध रखा, लेकिन उनका मन हमेशा भगवान में ही लगा रहा। अंततः भगवान ने उनका भी उद्धार किया। इससे स्पष्ट होता है कि ईश्वर भाव के भूखे हैं, भाव की दिशा महत्वपूर्ण है

विकार से भक्ति तक

जब मनुष्य अपने विकारों को ईश्वर की ओर मोड़ देता है, तो अद्भुत परिवर्तन होता है।
लालच ईश्वर को पाने की लालसा बन जाता है।
मोह भगवान के चरणों में लग जाता है।
क्रोध अधर्म के विरुद्ध शक्ति बन जाता है।

यही आध्यात्म की सच्ची प्रक्रिया है। यह दमन नहीं, बल्कि परिवर्तन है।

निष्कर्ष

विकार स्वयं में दोष नहीं, उनकी दिशा दोष या गुण बनाती है।
यदि वही भाव संसार में लगते हैं तो बंधन बनते हैं, और यदि ईश्वर में लगते हैं तो मुक्ति का मार्ग बन जाते हैं।

इसलिए जीवन का सार यही है कि
अपने हर भाव को ईश्वर की ओर मोड़ दो, वही तुम्हारा कल्याण कर देगा।

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