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कर्म इंसान के अधिकार में है, उसका फल देना ईश्वर के अधिकार में है।

AstroPine™

विषय:- कर्म प्रधान विश्व रची राखा।

जैसा कर्म करेंगे, वैसा फल मिलेगा।

शुद्ध रूप से सोच समझ कर निर्णय किया लेकिन फिर भी सीता का हरण हुआ, दशरथ की मृत्यु हुई और वनवास भोगना पड़ा। सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र ने हमेशा सत्य कहा लेकिन फिर भी नीच कलर डोम के हाथों बिके, मुर्दे जलाए तथा उसके घर में नौकर बनकर पानी भरा। राजा बनने के लिए अपने पुण्य कर्मों का सारा दान कर दिया लेकिन अंत में पाताल की प्राप्ति हुई। राजा नृग ने 1 करोड़ गायें दान कर दीं जिनमें गलती से एक ब्राह्मण की गाय दूसरे को दे दी। जब ब्राह्मण ने दूसरे ब्राह्मण के पास अपनी गाय पहचानी तो राजा ने मिलना चाहा कि आपने गलती से मेरी गाय ले ली है और बदले में दान कर दी। राजा ने तीनों के चरण पकड़कर क्षमा मांगी, लेकिन ब्राह्मण ने शाप देकर राजा को गिरगिट बना दिया। 1 करोड़ गायों का दान भी काम नहीं आया और राजा को गिरगिट बनना पड़ा।

पाण्डवों के मित्र, सारथी थे भगवान कृष्ण, लेकिन उन्हें भी पत्नी का अपमान झेलना पड़ा, राज्य खोया, वनवास गए, गुरु, दादा, पाण्डव द्रोपदी समेत युद्ध में गिरकर मरे। भगवान श्रीकृष्ण ने पाण्डवों के पापों के उद्धार के लिए घमण्ड चूर करवाया, लेकिन फिर भी भगवान श्रीकृष्ण का सारा वंश समाप्त हो गया। सूर्य देव और चन्द्रमा तक ग्रहण लगते हैं। इसे न रोका जा सकता है और न बदला जा सकता है।

कबीर ने कहा है कि कर्म की गति को कोई नहीं बदल सकता, कर्म के फल मिलकर ही रहते हैं और होते ही रहेंगे।

मण्डी, हिमाचल प्रदेश

कर्म प्रधान विश्व रची राखा।
जस जस भाव कर्म करैंगा,
तस तस भाव कर्मफल चाखा।।

लोगों के मन में गलतफहमी रहती है कि एस्ट्रोलॉजर कुछ हद तक बदल सकता है, जबकि सत्य कुछ और ही होता है। आपके खराब वक्त में आप कोई भी उपाय कर लीजिए, आपको तकलीफ होनी ही है। संसार में जो भी मनुष्य पैदा हुआ है उसे अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। कोई कितना भाग सकता है? जब तक कर्म भोग कर खत्म नहीं हो जाता तब तक कोई इससे नहीं बच सकता। चाहे आप कितना ही बड़ा उपाय या अनुष्ठान क्यों न कर लें।

कबीर ने कहा –

कर्म गति टारे नहीं टरी।
मुनि वशिष्ठ से पंडित ज्ञानी,
शोध के लान धरी।
सीता हरण, मरन दशरथ को,
वन में विपत्ति पड़ी।
नीच घर नीर भरावन हरिचंद,
बली पाताल धरी।
कोटि गाय नित पुण्य करत,
नृग गिरगिट जोन परी।
पाण्डव जिनके आप सारथी,
तिन पर विपत पड़ी।
दुर्योधन का गर्व घटायो,
यदुकुल नाश करी।
राहु केतु भानु चन्द्रमा,
विधि संजोग परी।
कहत कबीर सुनो रे भाई साधो,
होनी हो के रही।

अर्थ –

कर्म की गति चाह कर भी नहीं टाली जा सकती। श्रेष्ठ मुनि वशिष्ठ ने भगवान श्री राम और सीता का विवाह लग्न बहुत शुभ देखा, फिर भी सीता का हरण हुआ और दशरथ की मृत्यु हुई। सत्यवादी हरिश्चन्द्र को नीच घर में पानी भरना पड़ा। राजा बलि पाताल गए। राजा नृग को गिरगिट बनना पड़ा। पाण्डवों को कष्ट सहना पड़ा। दुर्योधन का गर्व टूटा और यदुवंश समाप्त हुआ। सूर्य और चन्द्रमा तक ग्रहण लगते हैं।

मीराबाई ने कहा –

कर्म गति टारे नहीं टरी।
सतवादी हरिचंद से राजा,
नीच घर नीर भरी।
पाँच पाण्डव अरु सती द्रौपदी,
हाड़ हिमालय भरी।
दुर्जन जनम लिया इन्द्रासन,
सूर पाताल धरी।

तुलसीदास जी का कथन –

विश्व कर्म प्रधान है और जिस भावना से कर्म किया जाता है उसी प्रकार फल मिलता है।

अंतिम विचार

अपने पूर्व जन्म के अच्छे-बुरे कर्मों को हम नहीं जानते हैं। जब हमें बुरे कर्मों का फल मिलता है तो ऐसी स्थिति होती है जैसे कि गरम रोटी गले में फंस जाती है। न उसे उगल सकते हैं और न निगल सकते हैं।

लेकिन यदि हम भगवान का नाम लेते हैं तो वह कष्ट कम हो सकता है। कर्मफल का बोझ तो उठाना ही पड़ेगा—चाहे समझ कर उठाएँ या रोकर उठाएँ।

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किस्मत को बदलने का सबसे सरल और प्रभावी तरीका है—अपने कर्मों को बदलना।

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