इष्ट

क्या भक्ति ईश्वर को जन्मकुंडली के अनुसार मानना चाहिए?

विषय:- कुंडली के अनुसार इष्टदेवी/इष्टदेव सही है या आपकी भक्ति भावना के अनुसार सही है।

सुविचार –
जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।

जेहि के जेहि पर सत्य सनेह, सो तेहि मिलहि न कछु सन्देह।

कुंडली दिखाते समय कुछ लोग एक बात बार-बार पूछते हैं कि कुंडली से हमारे इष्टदेव/इष्टदेवी बता दो कौन हैं? कोई बहुत ज्यादा ईश्वर वाला व्यक्ति तो नहीं होता लेकिन बहुत लोग अपने इस सवाल को जानना चाहते हैं।

ज्योतिषियों को कोई ना कोई मिल ही जाता है। सभी भगवान को किसी ना किसी रूप में मानते हैं। कोई साकार तो कोई निराकार में मानता है। सभी का अपना-अपना दृष्टिकोण होता है।

ज्योतिष का नियम ये कहता है कि जन्म कुंडली में पंचम भाव में स्थित ग्रहों और राशि के अनुसार इष्ट देव या देवी का चयन किया जाता है। कुछ करते हैं कि हम अपने ईष्ट को कैसे पहचानें?

नियम अनुसार ग्रहों से इष्ट देव:

सूर्य – विष्णु तथा राम
चंद्र – शिव, पार्वती, कृष्ण
मंगल – हनुमान, कार्तिकेय, स्कन्द
बुध – दुर्गा, गणेश
गुरु – ब्रह्मा, विष्णु, वामन
शुक्र – लक्ष्मी, मां गौरी
शनि – भैरव, यम, हनुमान, कूर्म
राहु – सरस्वती, शेषनाग, भैरव
केतु – गणेश, मत्स्य

राशि अनुसार इष्ट:

मेष – सूर्य, विष्णु
वृष – गणेश
मिथुन – सरस्वती, तारा, लक्ष्मी
कर्क – हनुमान
सिंह – शिव
कन्या – भैरव, हनुमान, काली
तुला – भैरव, हनुमान, काली
वृश्चिक – शिव
धनु – हनुमान
मकर – सरस्वती, तारा, लक्ष्मी
कुंभ – गणेश
मीन – दुर्गा, सीता

कुछ लोग अपनी कुंडली के अनुसार इष्ट जानना चाहते हैं ताकि जल्दी फल मिले, लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है।

तुलसीदास जी ने कहा है –
जाकी रही भावना जैसी,
प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।

श्रीमद्भगवद गीता में लिखा है –
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्।।
(अध्याय 7, श्लोक 21-22)

अर्थ:
जो भी भक्त जिस देवता को श्रद्धा से पूजना चाहता है, मैं उसकी श्रद्धा को उसी देवता में स्थिर कर देता हूँ।

इसका अर्थ है कि भक्ति का आधार श्रद्धा और भावना है, केवल कुंडली नहीं।

हर व्यक्ति अपने भाव से ईश्वर को प्राप्त कर सकता है।

निष्कर्ष:

आप जिस देवता में सच्ची श्रद्धा रखते हैं, वही आपके लिए सही इष्ट हैं।

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