मरण

मारण तन्त्र का स्वरूप और धर्म-अधर्म की सीमा

यदि सामने शेर हो और आपके प्राण संकट में हों तो शेर को मारना भी सही है। यह आत्मरक्षा है। लेकिन क्या किसी व्यक्ति पर तन्त्र क्रिया करके मारना सही है, यह गहन विचार का विषय है। यही वह बिंदु है जहाँ धर्म और अधर्म का अंतर स्पष्ट होता है।

चाणक्य और तन्त्रसिद्धि का प्रभाव

चाणक्य बहुत खतरनाक तान्त्रिक भी था और एक उत्कृष्ट ज्योतिषी भी था। उसने तन्त्रसिद्धि से तीर पर लगाने के लिए ऐसा पॉइजन बनाया था कि जिसे भी वह तीर लगता, वह पागल होकर लोगों को काटना शुरू कर देता। यदि उसे कोई काटने को न मिले तो वह स्वयं को काटना शुरू कर देता और मर जाता। जिन लोगों को वह पागल काटता, वे भी उसी की तरह दूसरों को काटना शुरू कर देते और यदि कोई काटने का न मिले तो स्वयं को काटकर मर जाते। कारण था तीर में लगा हुआ सिद्ध रसायन, जिसके प्रभाव से ऐसा व्यवहार उत्पन्न होता था।

सरल भाषा में कहें तो शत्रु की पूरी सेना को मारने के लिए एक तीर ही काफी था। उसके बाद चेन रिएक्शन शुरू हो जाता। एक तीर मारो और स्वयं हट जाओ, फिर सब आपस में एक-दूसरे को काटना शुरू कर देते और अंततः स्वयं नष्ट हो जाते।

युद्ध और धर्म की मर्यादा

युद्ध में मारना धर्म है। सैनिक को पहले अपनी रक्षा करना सिखाया जाता है, उसके बाद आक्रमण। डिफेंस में मारना पाप नहीं है। लेकिन समस्या तब होती है जब लोग युद्ध में नहीं, बल्कि छोटी-छोटी बातों में भी मारने की प्रवृत्ति अपना लेते हैं।

तन्त्र का दुरुपयोग और उसका पतन

जब हाथ-पैर से कुछ नहीं कर पाते तो लोग टोने-टोटके और तन्त्र क्रियाओं का सहारा लेते हैं। यह अत्यंत गलत कार्य है। यदि सीधे संघर्ष नहीं कर पाते तो तान्त्रिक के माध्यम से हानि पहुँचाने का प्रयास किया जाता है।

तन्त्र की विभिन्न क्रियाएँ

स्तम्भन का अर्थ है गति रोक देना। किसी का कारोबार ठप कर देना, कार्यस्थल पर तांत्रिक वस्तुएँ गाड़ देना, जिससे उसका जीवन प्रभावित हो जाए।

विद्वेषण का अर्थ है लड़ाई डाल देना। भाई-भाई में विवाद, पति-पत्नी में झगड़ा, परिवार का बिखरना।

उच्चाटन का अर्थ है मन को भटकाना। व्यक्ति मानसिक रूप से असंतुलित हो जाता है, नशे की ओर जाता है और धीरे-धीरे पतन की ओर बढ़ता है।

मारण तन्त्र सबसे खतरनाक है, जिसमें भूत-प्रेत आदि के माध्यम से हानि पहुँचाई जाती है। पुतली बनाकर सुई चुभाना, चित्र पर क्रिया करना, यह सब इसी के उदाहरण हैं। इससे अत्यंत पीड़ा होती है और मृत्यु तक संभव है।

पीड़ा की चरम स्थिति

कुछ तन्त्र ऐसे होते हैं जिनमें व्यक्ति जीवित रहते हुए भी असहनीय पीड़ा में रहता है। हिये फाड़ चोटी चढ़े, काया माही जीव रहे, साँस ना आवे पड़यो रहै। इसका अर्थ है कि व्यक्ति अत्यधिक पीड़ा में होते हुए भी जीवित रहे।

आप स्वयं विचार करें कि किसी को इतना कष्ट देना कितना बड़ा पाप है।

रिटर्न तन्त्र और उसका परिणाम

जब एक तान्त्रिक किसी पर क्रिया करता है और सामने वाला उसका निवारण कर देता है, तो वही तन्त्र वापस लौट आता है। रिटर्न तन्त्र दुगुने प्रभाव से वापस आता है और करने वाले को ही हानि पहुँचाता है।

एक उदाहरण में एक तान्त्रिक ने अपने भूत को दूसरे को मारने भेजा, लेकिन दूसरे तान्त्रिक ने उसे ही उल्टा उसके मालिक के विरुद्ध कर दिया। यह दर्शाता है कि तन्त्र का दुरुपयोग अंततः स्वयं पर ही भारी पड़ता है।

मूठबाण और उसका भयावह प्रभाव

मूठबाण अत्यंत खतरनाक मारण क्रिया है। इसमें विशेष विधियों से बाण तैयार कर लक्ष्य पर छोड़ा जाता है। कहा जाता है कि इसका प्रभाव अचानक होता है, व्यक्ति को असामान्य ध्वनियाँ सुनाई देती हैं और उसकी स्थिति बिगड़ जाती है।

यदि यह वापस लौट जाए तो भेजने वाले पर दुगने वेग से प्रहार करता है। इसलिए अनुभवी तान्त्रिक भी इसे बार-बार प्रयोग करने का साहस नहीं करते।

जीवन का सत्य और कर्मफल

मारण तन्त्र के अनेक प्रकार हैं और कुछ का प्रभाव पीढ़ियों तक बना रहता है। लेकिन प्रश्न यह है कि इसका उपयोग क्यों किया जाए। क्या दूसरों को कष्ट देकर सुख प्राप्त किया जा सकता है। उत्तर स्पष्ट है नहीं।

जो व्यक्ति ऐसे पापकर्म करता है उसका जीवन कभी सुखी नहीं रहता। अंततः वह मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से नष्ट हो जाता है।

सकारात्मक मार्ग और निष्कर्ष

जहाँ किसी को मारने के लिए हजारों मंत्रों का जाप करना पड़ता है, वहीं उसी समय को ईश्वर की उपासना में लगाया जाए तो जीवन सुधर सकता है।

गायत्री मंत्र और महामृत्युंजय मंत्र श्रेष्ठ हैं। ये मन को शुद्ध करते हैं और जीवन को सही दिशा देते हैं।

दूसरों को गिराने में समय नष्ट करने से बेहतर है स्वयं को ऊँचा उठाना। यही सच्चा धर्म है और यही जीवन का वास्तविक उद्देश्य है।

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