इच्छा

इच्छा का अन्त नहीं है, लेकिन जरूरत पूरी हो जाती है। इच्छा पूरी होने पर दुःख का कारण भी बनती है।

गीता का संदेश

श्रीमद्भागवत गीता में कहा गया है –

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्र्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति।।

अध्याय 2 श्लोक 71

भावार्थ

जिस व्यक्ति ने इन्द्रियतृप्ति की समस्त इच्छाओं का परित्याग कर दिया है, जो इच्छाओं से रहित रहता है और जिसने सारी ममता त्याग दी है तथा अहंकार से रहित है, वही वास्तविक शान्ति प्राप्त कर सकता है।

जरूरत बनाम इच्छा का अंतर

भोजन आपकी जरूरत है, यह जरूरत पूरी हो जाएगी। लेकिन दुनिया की हर चीज खाना आपकी इच्छा हो सकती है, आवश्यक नहीं कि यह इच्छा पूरी हो जाए। आपको पैसा मिलता है और जरूरत पूरी हो जाती है तो अच्छा है, लेकिन जब पड़ोसी से ज्यादा पैसा पाने की इच्छा होती है तो मन और मस्तिष्क परेशान हो जाता है। पड़ोसी कुछ नहीं कर रहा, वह अपने गुण के अनुसार कमा रहा है। आपने उससे तुलना करके स्वयं के पैर पर कुल्हाड़ी मारी है, क्योंकि आपकी इच्छा जाग रही है ऊँचा उठने की। इसलिए अपनी जरूरत पूरी करें और इच्छा के रोग से बचें।

संतोष और असंतोष का अंतर

जरूरत पूरी होने पर संतोष मिल जाता है, लेकिन इच्छा क्या करती है, यह इन कहानियों से समझिए।

अल्लाहद्दीन का चिराग और जिन्न की कहानी

एक आदमी को अल्लाहद्दीन का जादुई चिराग मिल गया। उसने उसे रगड़ा तो उसमें से जिन्न निकल आया। जिन्न बोला कि मैं तुम्हारी तीन इच्छाएँ पूरी करूँगा, उसके बाद तुम्हारी जान ले लूँगा। आदमी ने कहा कि मुझे आज ही दस लाख रुपये चाहिए। जिन्न ने कहा कि शाम तक मिल जाएंगे।

शाम को एक व्यक्ति उसके घर आया और दरवाजा खटखटाया। दरवाजा खोलते ही उसने दस लाख रुपये से भरा बैग उसके हाथ में देते हुए कहा कि आपकी गाड़ी के नीचे आकर आपका बेटा मर गया। उसके बदले में यह रुपये देने आया हूँ। इतना सुनते ही वह आदमी बेहोश हो गया।

होश आने पर उसने जिन्न को बुलाया और दूसरी इच्छा जताई कि उसका बेटा उसे जीवित लौटा दिया जाए। जिन्न ने कहा कि शरीर बुरी तरह क्षत-विक्षत हो चुका है, इसलिए उसे जीवित करना कठिन है, लेकिन उसकी आत्मा को घर में ला सकता हूँ। थोड़ी ही देर में उसके बेटे की भटकती हुई आत्मा घर में आ गई, जो प्रेत बन चुकी थी। अब माता-पिता और अधिक परेशान हो गए। उन्होंने जिन्न से प्रार्थना की कि वह वहाँ से चला जाए। जिन्न चला गया, लेकिन कुछ समय बाद वापस आकर बोला कि तीनों इच्छाएँ पूरी हो चुकी हैं, अब तुम्हें मारना बाकी है। और उसने उन्हें मार दिया।

जीवन का कठोर सत्य

माता-पिता की मृत्यु जीवन का एक बड़ा सत्य है। एक लड़के ने भगवान से प्रार्थना की कि उसके माता-पिता जीवित रहें। भगवान ने उसकी इच्छा पूरी कर दी, लेकिन वह स्वयं अपने माता-पिता से पहले चल बसा। अब माता-पिता को जीवन भर अपने पुत्र की मृत्यु का दुःख सहना पड़ा।

हिमालय की जड़ी-बूटी की कहानी

एक सैनिक की ड्यूटी हिमालय क्षेत्र में लगी थी। वहाँ उसकी मुलाकात एक साधक से हुई, जिसने अपनी आयु आठ सौ वर्ष बताई। उसने बताया कि हिमालय में एक ऐसी जड़ी-बूटी है जिसे खाने से न बुढ़ापा आता है, न बीमारी और न मृत्यु। वर्ष में एक बार इसे लेना होता है, और जब मरने का मन हो तो इसे लेना बंद कर देना चाहिए।

सैनिक ने वह जड़ी-बूटी खाना शुरू कर दिया और हमेशा युवा बना रहा। उसकी पत्नियाँ बूढ़ी होती रहीं और वह नई शादियाँ करता गया। उसकी कई पीढ़ियाँ बढ़ती गईं, लेकिन उसकी जीवित रहने की इच्छा समाप्त नहीं हुई। सैकड़ों वर्षों बाद उसका विशाल परिवार फैल गया।

एक दिन जब वह जड़ी-बूटी लेने गया और लौटकर आया, तो उसने देखा कि एक मैदान में सैकड़ों शव जलाए जा रहे हैं। पास जाकर देखा तो वे सभी उसकी ही पीढ़ियों के लोग थे, जो एक महामारी में मर गए थे। यह दृश्य देखकर उसे गहरा सदमा लगा और वह इतना विचलित हो गया कि जड़ी-बूटी का ज्ञान ही भूल गया।

यदि वह सामान्य मृत्यु को स्वीकार करता, तो शायद इतना दुःख नहीं झेलता।

निष्कर्ष

इन सभी उदाहरणों से स्पष्ट है कि कुछ इच्छाएँ उचित होती हैं, लेकिन अनेक इच्छाएँ अनावश्यक और दुःख का कारण बनती हैं। इसलिए इच्छा से अधिक जरूरत को महत्व देना चाहिए।

भक्त प्रह्लाद ने भगवान से यही वर माँगा था कि उनकी सभी इच्छाएँ समाप्त हो जाएँ।

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