सुख दुःख

श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-
यस्याहमनुगृह्णामि हरिष्ये तद्धनं शनैः।
ततोऽधनं त्यजन्त्यस्य स्वजनाः दुःखदुःखितम्॥ (10.88.8)

अर्थ: जिस पर मैं विशेष कृपा करता हूँ, उसका धन धीरे-धीरे छीन लेता हूँ। जब वह निर्धन हो जाता है, तो उसके अपने भी उसे छोड़ देते हैं और वह दुखी होता है।

इस श्लोक का अर्थ बहुत गहरा है। सामान्य दृष्टि से यह कठोर प्रतीत होता है, परंतु वास्तव में यही ईश्वर की सर्वोच्च करुणा का रूप है। मनुष्य जब धन, प्रतिष्ठा, संबंध और बाहरी सुखों में उलझ जाता है, तब उसका मन ईश्वर से दूर हो जाता है और वह अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है। भगवान जब किसी पर विशेष कृपा करते हैं, तो वे उसके झूठे सहारों को तोड़ते हैं, ताकि वह भीतर की ओर मुड़े और आत्मा तथा परम सत्य का अनुभव कर सके। इसलिए भक्त के जीवन में आने वाला दुख वास्तव में पतन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति की शुरुआत होता है।

श्रीमद्भगवद्गीता में इस स्थिति को और स्पष्ट करते हुए कहा गया है-
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥ (2.14)

अर्थ: इंद्रियों के विषयों से उत्पन्न सुख और दुख अस्थायी हैं, वे आते-जाते रहते हैं; इसलिए उन्हें धैर्यपूर्वक सहन करना चाहिए।

यहाँ भगवान यह समझाते हैं कि दुख स्थायी नहीं होता, वह केवल एक अस्थायी अवस्था है। भक्त इस सत्य को समझकर दुख से विचलित नहीं होता, बल्कि उसे सहन करता है और उससे सीखता है। यही सहनशीलता धीरे-धीरे उसके भीतर वैराग्य उत्पन्न करती है। जब बार-बार जीवन में असफलताएँ आती हैं और अपेक्षाएँ टूटती हैं, तब मनुष्य को संसार की नश्वरता का अनुभव होता है और उसका झुकाव भक्ति की ओर होने लगता है।

इसी भाव को आगे श्रीमद्भागवत महापुराण में कहा गया है-
तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो
भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्।
हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते
जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक्॥ (10.14.8)

अर्थ: जो व्यक्ति अपने कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त दुख को भी भगवान की कृपा मानकर सहन करता है और मन, वाणी तथा शरीर से भगवान को प्रणाम करता है, वह मुक्ति का अधिकारी बन जाता है।

यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भक्त दुख को विरोध नहीं करता, बल्कि उसे स्वीकार करता है। वह यह समझता है कि यह उसके ही कर्मों का परिणाम है और भगवान की कृपा से ही वह इसका भोग कर रहा है। यही दृष्टिकोण उसे आंतरिक शांति देता है और धीरे-धीरे उसे ईश्वर के निकट ले जाता है।

अब दूसरी ओर देखें तो श्रीमद्भगवद्गीता में कर्म की गहनता को बताते हुए कहा गया है-
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥ (4.17)

अर्थ: कर्म, विकर्म और अकर्म—इन सबको समझना चाहिए, क्योंकि कर्म की गति अत्यंत गहन है।

इसका अर्थ यह है कि जो हम वर्तमान में देख रहे हैं, वह पूरी कहानी नहीं है। दुष्ट व्यक्ति का सुख उसके वर्तमान कर्मों का परिणाम नहीं होता, बल्कि उसके पूर्व संचित पुण्यों का फल होता है। इसलिए वह बाहर से सुखी, समृद्ध और सफल दिखाई देता है, लेकिन यह स्थिति स्थायी नहीं होती।

इसी सत्य को आगे गीता में स्पष्ट किया गया है-
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं
क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना
गतागतं कामकामा लभन्ते॥ (9.21)

अर्थ: जब पुण्य समाप्त हो जाते हैं, तब व्यक्ति पुनः नीचे गिरता है और जन्म-मरण के चक्र में लौट आता है।

अर्थात् दुष्ट व्यक्ति पहले अपने पुण्यों का भोग करता है और जब वे समाप्त हो जाते हैं, तब उसके पाप कर्मों का फल प्रारंभ होता है, जो प्रायः अधिक कष्टदायक होता है। यही कारण है कि उसका प्रारंभ सुखमय और अंत दुःखमय होता है।

इसके साथ ही गीता यह भी स्पष्ट करती है-
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥ (2.66)

अर्थ: जिसके भीतर शांति नहीं है, उसे वास्तविक सुख कभी प्राप्त नहीं हो सकता।

इसका सीधा अर्थ है कि दुष्ट व्यक्ति का सुख केवल बाहरी होता है, भीतर से वह अशांत और भयभीत रहता है। इसके विपरीत, भक्त का जीवन भले ही संघर्षपूर्ण हो, लेकिन उसके भीतर संतोष और ईश्वर का विश्वास होता है, जो उसे स्थिर बनाए रखता है।

अंत में भगवान का यह वचन इस पूरे विषय का निष्कर्ष प्रस्तुत करता है-
न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति॥ (6.40)

अर्थ: जो व्यक्ति शुभ कर्म करता है, उसका कभी बुरा अंत नहीं होता।

इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भक्त का दुख वास्तव में उसके उत्थान की प्रक्रिया है, जबकि दुष्ट का सुख उसके पतन की प्रस्तावना है। भगवान इस सृष्टि में पूर्ण न्याय और संतुलन बनाए रखते हैं; वे किसी के साथ अन्याय नहीं करते, बल्कि प्रत्येक को उसके कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं। जब यह दृष्टि मनुष्य में विकसित हो जाती है, तब वह जीवन की परिस्थितियों से भ्रमित नहीं होता, बल्कि उन्हें ईश्वर की योजना का हिस्सा मानकर स्वीकार करता है और अपने मार्ग पर स्थिर रहता है।

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