
किस दिशा में होती है सकारात्मक ऊर्जा।
विषय:- जानें किस दिशा में है कैसी ऊर्जा।
किस दिशा में क्या होना शुभ है।
नैऋत्य कोण –
दक्षिण और पश्चिम दिशा के बीच वाला कोण नैऋत्य कोण कहा जाता है। यह भाग पश्चिम दिशा के देवता वरुण तथा दक्षिण के देवता यम की शक्ति से यह भाग बना है। यह शीतल स्वभाव तथा क्रूर स्वभाव का मिश्रण है। इस दिशा में अस्त्र-शस्त्र रखना उचित रहता है क्योंकि यह संहारक प्रकृति वाला कोण है, इसलिए इस दिशा में स्थान ऊंचा हो तो अच्छा रहता है जो कि शत्रु के भय से बचाव करता है। इस दिशा में नीले रंग अच्छा है। कृष्ण वर्ण के शीशे या पर्दे लगाना शुभ रहता है।
पश्चिम –
यह दिशा वरुण देव की दिशा है और मगरमच्छ इनका वाहन है। यह शीतल प्रकृति की दिशा है और स्वभाव कुछ लचीला है। अस्त होते हुए सूर्य की किरणें दिशा की तरफ से पड़ती हैं। इसलिए इस दिशा में खिड़की या दरवाजा होना कुछ अच्छा नहीं माना जाता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से अस्त होते हुए सूर्य की किरणें अच्छी नहीं मानी जाती हैं। यह भाग भी ऊंचा रखना चाहिए। इस भाग में पानी का स्रोत लगाया जा सकता है लेकिन शर्त है कि पानी का स्रोत सीधे पश्चिम की दिशा में ही हो और पानी पीते समय मुंह पश्चिम दिशा की तरफ ना हो। जितना संभव हो सके इस दिशा में खिड़कियां कम ही रखनी चाहिए। यदि पर्दे और कांच लगाते हो तो सफेद रंग के लगाने चाहिए।
वास्तु शास्त्र में दिशाओं का महत्व
आग्नेय अथवा अग्निकोण –
वास्तु शास्त्र में पूर्व और दक्षिण दिशा के बीच के भाग को आग्नेय कोण अथवा अग्नि कोण कहते हैं। इस दिशा में इन्द्रदेव तथा अग्नि देवता की शक्ति का मिलन कहा जाता है। यह एक शक्तिशाली और ऊर्जा वाली दिशा है। इस दिशा में ज्वलनशील चीज रखी जानी चाहिए जैसे कि चूल्हा रखना, हवन करना या आग सेकने के लिए स्थान बनाना इस दिशा में उत्तम रहता है।
दक्षिण दिशा –
इस दिशा के स्वामी यम हैं और इनका कृष्ण वर्ण है। यह न्याय करते हैं तथा इन्हें न्यायाधिपति भी कहा जाता है। दंड इनका अस्त्र है तथा यह सूर्य देव के पुत्र होने के कारण धन-धान्य की समृद्धि देने वाले हैं। दक्षिण दिशा को पितरों की दिशा भी कहा जाता है। इस दिशा में भारी चीज रखी जाना सही माना जाता है तथा घर के दक्षिण हिस्से में ऊंचाई होना शुभ माना जाता है। इस दिशा का स्थान यदि ऊंचा हो तो वह लाभ देने वाला होता है। पितरों की तस्वीर दक्षिण दिशा में लगाई जानी चाहिए और जीवित व्यक्ति को कभी दक्षिण दिशा की तरफ पैर करके भी नहीं सोना चाहिए।
वायव्य कोण –
वायव्य कोण पश्चिम तथा उत्तर दिशा के बीच का कोण है। उत्तर दिशा के मालिक कुबेर तथा पश्चिम दिशा के मालिक वरुण की शक्ति इस कोण में समाहित रहती है और इस दिशा में वायु का आधिपत्य है। इस दिशा का स्थान भी ऊंचा रखना चाहिए। यदि इस दिशा की तरफ का स्थान नीचे हुआ तो इसका अशुभ प्रभाव बढ़ेगा और यदि इस दिशा में अशुभ प्रभाव बढ़ता है तो शत्रु भी मित्र जैसा व्यवहार करने लग जाते हैं। इस दिशा में हरे रंग के कांच लगाना शुभ रहता है।
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