कर्मफल

कर्मफल

कर्म प्रधान विश्व रची राखा,
जो जस करहि,
सो तस फल चाखा।

संकट के समय ईश्वर आपको सहारा देकर फिर बेसहारा क्यों कर देता है?

विषय:- आज नहीं तो कल, कर्मफल मिल के रहेगा।

संकट के समय में ईश्वर आपको सहारा देकर फिर बेसहारा कर देता है तो इसका अर्थ ये नहीं कि ईश्वर बेरहम है।

गरीबी में भटकना पड़ा, लेकिन दूसरे पक्ष में सुदामा की भगवान के प्रति श्रद्धा और भक्ति भी थी, जिसके फलस्वरूप बाद में सुदामा महलों में रहने लगा था।

शास्त्रों में कहा है –

अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।
नाभुक्तं क्षीयते कर्म जन्म कोटिशतैरपि॥

अर्थ – शुभ और अशुभ कर्मों का फल भुगतना ही पड़ता है। अगर अभी कर्मफल नहीं भुगता तो कर्मफल करोड़ों सैंकड़ों जन्मों तक भी क्षीण नहीं होगा।

एक कहानी

किसी गांव में एक सिपाही को खजाने की पहरेदारी का काम दिया गया था। खजाने को देखकर उसकी नियत खराब हो गई। उसने एक थैले में कुछ सोना भरा और अपने घर चल दिया।

रास्ते में एक व्यक्ति ने उसे देखा और कहा कि भाई तुम पहरेदार होकर खजाने की चोरी कर रहे हो। सिपाही ने कहा कि तुम थोड़ा बहुत सोना ले लो और मुझे जाने दो।

उस व्यक्ति ने सोना लेने से इनकार कर दिया। सिपाही ने सीटी बजाकर लोगों को इकट्ठा किया और कहा कि यह व्यक्ति खजाने से सोना चोरी करके भाग रहा है। उस व्यक्ति को झूठे मुकदमे में फंसा दिया गया।

राज दरबार में उसे फांसी की सजा सुनाई गई। वह व्यक्ति गिड़गिड़ाता रहा कि मैं निर्दोष हूं, मुझे फंसाया गया है।

राजा ने सिपाही से कहा कि इसे दूसरे कमरे में ले जाओ और कुछ देर इंतजार करो। दूसरे कमरे में एक लाश रखी गई थी। वहां सिपाही और वह व्यक्ति बैठ गए।

सिपाही ने कहा कि मैंने तुझे पहले ही कहा था कि थोड़ा सोना ले ले और मुझे जाने दे, लेकिन तू नहीं माना, इसलिए आज यह सजा भुगत रहा है।

तभी राजा वहां छिपकर सब सुन रहा था। राजा ने सिपाही की सच्चाई जान ली और सिपाही को दंडित किया।

बाद में जांच में पता चला कि जिस व्यक्ति को फांसी दी जा रही थी, उसने कई साल पहले एक व्यक्ति की हत्या की थी, लेकिन पकड़ा नहीं गया था।

राजा ने कहा कि यह सजा तुम्हें उसी कर्म का फल है, चाहे कारण कुछ भी दिखाई दे।

दूसरी घटना (वैज्ञानिक उदाहरण)

एक मित्र का समय बहुत खराब चल रहा था। व्यवसाय में जब भी नुकसान होने लगता, अचानक पैसा आ जाता, लेकिन कुछ ही दिनों में फिर खत्म हो जाता।

उसने पूछा ऐसा क्यों होता है।

उसे एक वैज्ञानिक का उदाहरण बताया गया।

वैज्ञानिक ने एक चूहे को पानी में डाला। लगभग डेढ़ घंटे बाद वह चूहा मर गया।

फिर उसने दूसरे चूहे को पानी में डाला। जब वह मरने ही वाला था, तो उसे निकालकर कुछ देर आराम दिया और फिर वापस पानी में डाल दिया।

इस बार चूहा लगभग 60 घंटे तक जिंदा रहा।

कारण यह था कि उसे आशा मिल गई थी कि कोई उसे बचा सकता है।

इसी प्रकार जब हमारा समय खराब होता है तो ईश्वर कुछ समय के लिए हमारी मदद करता है और फिर हमें उसी स्थिति में छोड़ देता है, ताकि हम उम्मीद न खोएं और संघर्ष करते रहें।

सुदामा का प्रसंग

सुदामा भगवान कृष्ण के मित्र थे, लेकिन उनका जीवन गरीबी में बीता। यह उनके पूर्व कर्मों का परिणाम था।

जब उनके कर्म समाप्त हुए, तब भगवान कृष्ण ने उन्हें सम्मान और समृद्धि दी।

अंतिम निष्कर्ष

यदि आज हम बिना कारण दुःख झेल रहे हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि ईश्वर हमारे साथ अन्याय कर रहा है।

यह हमारे कर्मों का परिणाम है।

यदि अभी नहीं भुगता तो भविष्य में भुगतना ही पड़ेगा।

कर्मफल से कोई बच नहीं सकता।

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