
प्रारब्ध को नहीं बदला जा सकता है, सिर्फ कुछ हद तक फेरबदल सम्भव हो सकता है।
सुविचार –
प्रारब्ध के आगे मनुष्य विवश है।
विषय:- प्रारब्ध ईश्वर ने हमारे कर्मों के अनुसार ही रचा है।
पहले प्रारब्ध रचा, पाछे रचा शरीर।
तुलसी चिन्ता क्यों करे, भज ले तू रघुवीर।
पुरुष उसका सन नहीं रहा था उसकी ही गर्मे में स्त्री ने अपने पति की तलवार से पति की गर्दन काट दी और अपने कपड़े फाड़ के जोर जोर से चिल्लाने लगी कि लूट गई, बर्बाद हो गई, इस पति को मार डाला। लोग इकट्ठे हो गए, सबने मिलकर उस शरीफ इंसान को पीटा, और पंचायत ने उसके दोनों हाथ काट दिए।
बचारा जैसे तैसे जीवन चला। कुछ समय बाद वो एक ज्योतिषी के पास गया और बोला कि महाराज ज्योतिष में गणना लगाइए कि मेरे साथ ये क्या हो गया और क्यों हो गया, कुछ समाधान निकालिए।
ज्योतिषी ने कहा कि अपने समाधान पूछने आया है और इधर आप खुद मार खा रहे हो। पहले अपना समाधान कर लो फिर अपने सवाल का।
ज्योतिषी ने कहा कि तुम पिछले जन्म में साधु थे, सैनिक एक कसाई था और स्त्री गाय थी। कसाई गाय को मारने के लिए दौड़ रहा था और गाय जान बचाने को भाग रही थी। तुमने अपने हाथों से उस गाय को पकड़कर नीचे गिरा दिया जिससे कसाई ने उसकी गर्दन काट दी।
अब वर्तमान जन्म में वही स्त्री पत्नी बनी, कसाई सैनिक बना, और तुम्हारे हाथ काट दिए गए। जिस अंग से पाप किया उसी अंग से दंड मिला।
प्रारब्ध अकाट्य है। जन्मकुंडली में जो प्रारब्ध लिखा होता है वह इस जन्म में भोगना ही पड़ता है। जो फल कर्मों के अनुसार बनते हैं, वे बदल नहीं सकते।
हमारे जीवन का लगभग 65% हिस्सा ऐसा होता है जिसे बदलना संभव नहीं होता। बाकी 35% कर्म करने के लिए स्वतंत्रता है।
यही 65% अकाट्य हिस्सा है जो बदलता नहीं है, उसे प्रारब्ध कहते हैं।
यह प्रश्न युधिष्ठिर से पूछा गया कि भाग्य क्या होता है?
युधिष्ठिर ने कहा — कर्म के फल को ही भाग्य कहते हैं।
भीष्म पितामह को बाणों की शैय्या मिली क्योंकि उन्होंने पिछले जन्म में एक सांप को कंटीली झाड़ी पर फेंक दिया था।
इस पाप के फलस्वरूप उन्हें बाणों की शैय्या पर लेटना पड़ा। यह प्रारब्ध है, जिसे काटने में आधा जीवन या पूरा जीवन भी लग सकता है।
एक बार एक सीधा सादा व्यक्ति भगवान के दर्शन के लिए यात्रा पर जा रहा था। रास्ते में किसी सैनिक के घर में रुक गया। सैनिक शराबी था। रात को उसने अपनी पत्नी को शराब पिलाई और उसे पीटा।
पत्नी ने कहा कि भाग जाओ नहीं तो मार डालेगा। वह व्यक्ति भागा और बच गया।
लेकिन बाद में उसे समझ आया कि ये सब भी प्रारब्ध का ही हिस्सा था।
कई बार भगवान भी प्रारब्ध नहीं बदलते।
जैसे — नारद जी ने विष्णु जी से कहा कि मुझे सुंदर बना दो, लेकिन उन्हें वानर रूप मिला।
भगवान राम के जीवन में भी प्रारब्ध था — सीता हरण हुआ, वनवास मिला।
इसलिए प्रारब्ध को समझना चाहिए।
35% स्वतंत्रता भगवान ने दी है, उसमें अच्छे कर्म करने चाहिए।
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