
पाप कर्म ईश्वर के नजदीक नहीं आने देते, किसी न किसी तरह से दूरी बन जाती है।
विषय:- पापकर्म समाप्त होते ही ईश्वर कृपा की अनुभूति होती है।
ईश्वर के द्वार में लोगों की भीड़ लगी रहती है। उन्हें क्या मिलता है वहाँ घंटों तक पंक्ति में खड़े रहने से? क्यों लोग सैकड़ों किलोमीटर दूर से काँवड़ में गंगाजल भरकर ले जाते हैं? भगवान उन्हें क्या दे देता है?
ऐसे बहुत से सवाल उन लोगों के मन में आ जाते हैं जो लगभग नास्तिक प्रवृत्ति के होते हैं। नास्तिकता बुरी चीज नहीं है, नास्तिक लोग आँखों देखी चीजों पर विश्वास करते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण जी ने श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है कि मुझे चर्मचक्षुओं से नहीं देखा जा सकता है। मुझे देखने के लिए दिव्य दृष्टि की आवश्यकता है, जो तभी मिलती है जब मैं चाहता हूँ। मानव नेत्र से ईश्वर को देख पाना तभी संभव है जब ईश्वर स्वयं चाहें।
ईश्वर को देखने वाला व्यक्ति मछली में भी मत्स्यावतार की कल्पना कर लेता है और सूर्य को देखकर भी ईश्वर के साक्षात होने का प्रमाण मान लेता है। लेकिन जब तक ईश्वर नहीं चाहता, तब तक इस प्रकार के विचार भी मन में नहीं आ पाते।
कुछ लोग ईश्वर पर विश्वास करते हैं लेकिन फिर भी भगवान उन्हें नहीं सुनता है, ऐसा क्यों?
जब तक मनुष्य के पापकर्म समाप्त नहीं हो जाते, तब तक ईश्वर कृपा प्राप्त नहीं होती।
संत श्री तुलसीदास जी ने जब भगवान श्रीराम जी को ढूंढना चाहा, तो बाबूल के पेड़ पर लटके प्रेत ने कहा कि मैं तुम्हें भगवान राम से मिलने का रास्ता बताता हूँ।
प्रेत ने कहा, जहाँ भी श्रीराम कथा होती है, वहाँ सबसे पहले हनुमान जी आते हैं और सबसे बाद में जाते हैं। उनके चरण पकड़ लेना और कहना कि भगवान श्रीराम जी के दर्शन करवा दो। हनुमान जी दर्शन करवा देंगे।
तुलसीदास जी ने कहा कि ओ भले मानस, तुझे इतना ही ज्ञान है राम जी के दर्शन का, तो खुद दर्शन क्यों नहीं कर लेता?
प्रेत ने कहा , मैं पापकर्मों के कारण प्रेत बनकर भटक रहा हूँ। जब पापकर्म समाप्त होंगे, तब सबसे पहले हनुमान जी की शरण में जाऊँगा, श्रीराम जी के दर्शन करूंगा। लेकिन जब तक पापकर्म हैं, मैं ईश्वर के पास नहीं जा सकता। ये पापकर्म मेरे हैं, ईश्वर के नहीं।
इसी प्रकार एक ईश्वर भक्त मंदिर जाता था। अक्सर उसकी बारी आने पर प्रसाद समाप्त हो जाता था।
एक दिन वह दुखी होकर पुजारी से बोला कि आप प्रसाद थोड़ा अधिक बनाया करो। मैं मंदिर आता हूँ लेकिन मुझे मिलने से पहले ही प्रसाद समाप्त हो जाता है।
पुजारी ने अगले दिन अधिक प्रसाद बनाया, लेकिन उस व्यक्ति की बारी आने से पहले ही प्रसाद समाप्त हो गया। ऐसा कई दिन तक चलता रहा।
एक दिन वह व्यक्ति बोला, भगवान, तुम ऐसा क्यों करते हो? मैं आप पर बड़ी श्रद्धा रखता हूँ, फिर प्रसाद नसीब में क्यों नहीं है?
रात को उसे स्वप्न में भगवान ने दर्शन दिए और कहा,
जब तक तुम्हारे पापकर्म समाप्त नहीं हो जाते, तब तक किसी न किसी रूप में तुम्हें मेरी कृपा प्राप्त होने में रुकावट आती रहेगी।
पाप अधिक है तो प्रसाद भी नसीब नहीं होता। तुम्हें दर्शन हो रहे हैं, वही बड़ी बात है।
जो मंदिर जाते हैं, काँवड़ में जल उठाकर सैकड़ों किलोमीटर दूर जाकर शिवजी का अभिषेक करवाते हैं, वे इसलिए करवाते हैं क्योंकि उन्होंने ईश्वर को महसूस किया है।
वह एहसास ही उन्हें सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने की शक्ति देता है।
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