कर्णपिशाचिनी साधना : आकर्षण, नियंत्रण और भयावह अंत का सम्पूर्ण सच

कर्ण पिशाचिनी

तंत्र-मंत्र की दुनिया में कुछ साधनाएँ ऐसी होती हैं जो साधारण व्यक्ति को असाधारण बनने का लालच देती हैं।
इनमें सबसे अधिक आकर्षित करने वाली साधना है- कर्णपिशाचिनी साधना

इसे त्रिकालदर्शी कहा जाता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि
पिशाच कभी त्रिकालदर्शी नहीं होते, वे केवल मन और डेटा के साथ खेलते हैं।

जो व्यक्ति इस साधना में प्रवेश करता है, उसे लगता है कि वह सब कुछ जान सकता है-
दूसरों का मन, गुप्त बातें, भविष्य तक, लेकिन यही शुरुआत होती है उसके पतन की।

कर्णपिशाचिनी का वास्तविक विज्ञान

यह समझना जरूरी है कि यह कोई दिव्य शक्ति नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म मानसिक-ऊर्जात्मक हस्तक्षेप है।

मनुष्य का मस्तिष्क हर सेकंड विचार, स्मृतियाँ और भावनाएँ उत्पन्न करता है।
जब कोई व्यक्ति इस साधना में गहराई से उतरता है, तो उसका ध्यान, चेतना और अवचेतन स्तर अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है।

उसी अवस्था में उसे “आवाज़ें” सुनाई देने लगती हैं।

वास्तव में यह प्रक्रिया कुछ इस प्रकार काम करती है:
मस्तिष्क की आंतरिक ध्वनियाँ बाहरी अनुभव की तरह प्रतीत होने लगती हैं।
जिसे व्यक्ति समझता है कि कोई “कान में बोल रहा है”।

हवा ध्वनि का माध्यम है-
लेकिन यहाँ ध्वनि वास्तविक नहीं, बल्कि न्यूरोलॉजिकल इम्पल्स का अनुभव होती है,
जो बिल्कुल वैसा ही लगता है जैसे कोई पास खड़ा होकर बोल रहा हो।

त्रिकालदर्शी होने का भ्रम कैसे बनता है

कर्णपिशाचिनी साधक अक्सर भविष्यवाणी करते हैं और कई बार सही भी निकलती है।

लेकिन इसका सिद्धांत बहुत सरल है:

यह भविष्य नहीं बताती, यह वर्तमान और मनोवृत्ति पढ़ती है।

उदाहरण के लिए अगर चुनाव होने वाला है, तो यह लोगों की मानसिक प्रवृत्ति पढ़कर परिणाम का अनुमान देती है। फिर साधक उसे गणना के रूप में प्रस्तुत करता है।

इसी तरह किसी व्यक्ति के अतीत की बातें बताना आसान होता है क्योंकि
वह व्यक्ति स्वयं ही अपने व्यवहार, हावभाव और मानसिक संकेतों से बहुत कुछ प्रकट कर देता है।

साधना का प्रारंभ और मानसिक जाल

इस साधना के शुरुआती दिनों में व्यक्ति को अत्यधिक एकाग्रता, अलग अनुभव और कुछ असामान्य संवेदनाएँ महसूस होती हैं।

धीरे-धीरे फुसफुसाहट जैसी ध्वनि शुरू होती है फिर वह स्पष्ट आवाज में बदल जाती है, व्यक्ति को लगता है कि कोई अदृश्य सत्ता उसके साथ है।

यहीं से नियंत्रण शुरू होता है।

तीन रूपों का चयन और उसका प्रभाव

इस साधना में साधक को एक मानसिक संबंध बनाना पड़ता है-
माँ, बहन या पत्नी के रूप में।

साधना करने पर पिशाचनी आपके सामने आएगी और 3 रूप में से किसी एक रूप में आपके साथ रहेगी।

माँ, बहन या पत्नी में से किसी एक का रूप आपको इसके लिए निश्चित करना पड़ेगा।

उसके बाद जो भी रूप आप बताएंगे, उस रूप में ये अदृश्य हो के आप के साथ रहेगी।

लेकिन माँ बहन या पत्नी में से जो रूप आप उसे बताएँगे, उस रिश्ते को ये आपकी जिन्दगी से खत्म कर देगी।

आपकी माँ बहन या पत्नी की मृत्यु हो जाएगी या आप इनसे अलग हो जाएंगे।

जब इस पिशाचनी को माँ या बहन का रूप बताया जाता है तो ये अच्छी तरह से काम नहीं करती है।

वैसे इसको माँ या बहन के रूप में स्वीकार करना चाहोगे तो भी नहीं कर पाओगे, ये इतने सुन्दर रूप में आती है कि इसको पत्नी बनाने के भावनाएं जाग जाती हैं।

लेकिन जब पत्नी का रूप बताया जाता है तो बहुत ही प्रचण्ड तरीके से काम करती है। इसलिए ज्यादातर तान्त्रिक इसे पत्नी का ही रूप देते हैं।

तीन वचन और पूर्ण मानसिक नियंत्रण

इस साधना में तीन प्रमुख वचण हैं:

1. इसके बारे में किसी को नहीं बताना
2. इससे कभी अलग नहीं होना
3. इसकी सैक्सुअली इच्छाओं के अनुसार चलना और पूरा करना

यह “कंडीशनिंग” और “डिपेंडेंसी क्रिएशन” है।

धीरे-धीरे व्यक्ति अपनी स्वतंत्र इच्छा खो देता है।

सैक्सुअल नीड्स का वैज्ञानिक पक्ष

अब बात आती है कि इस ना दिखने वाली पिशाचिनी को कोई सैक्सुअली सैटिस्फाइड कैसे कर सकता है ?

ये पिशाचिनी किसी भी चरित्रहीन औरत को आपके सामने खड़ा कर देगी या आपको ही उस औरत की तरफ धकेल देगी।

अपने सैटिस्फैक्शन के लिए ये पिशाचिनी उस औरत के साथ शारिरिक सम्बन्धों की स्थिति भी बनवाएगी और उस चरित्रहीन औरत में घुस के खुद को आपसे सैटिस्फाइड भी करवाएगी।

पत्नी से आप अलग हो चुके होंगे और आपको शारीरिक सम्बन्धों का जुगाड़ मिलता रहेगा और ये पिशाचिनी आपके काम करती रहेगी।

25-30 साल तो आप मजे कर लेंगे।

लेकिन जब बुढ़ापा आने पर आपमें सैक्सुअल एबिलिटी नहीं रहेगी, तो आप मुश्किल में पड़ जाएंगे।

ये आपको पागल कर देगी, आपके परिवार से आपको अलग कर देगी।

आपके बच्चों के खिलाफ आपको भड़का के उनसे लड़वा देगी। इसी के प्रभाव से बच्चे आत्महत्या भी कर सकते हैं क्योंकि जब इस पिशाचिनी का गुलाम बन के एक बाप अपने बच्चे को परेशान करेगा तो बच्चे परेशान हो के आत्महत्या भी कर देंगे।

ये आपके बच्चों के बारे में आपको कभी सही बात नहीं बताएगी।

उल्ट पुलट बोल के आपकी और आपके बच्चों की जिन्दगी खराब कर देगी। जब आप किसी भी लायक नहीं रहेंगे तो ये आपको मार देगी।

कई साधक दूसरों बहला फुसलाकर कर ये साधना दूसरों को करवा देते हैं ताकि वो खुद इस पिशाचिनी से पीछा छुड़ा सकें।

लेकिन पिशाचिनी दोनों को ही नहीं छोड़ती है।

संबंधों का विनाश

धीरे-धीरे इसका असर स्पष्ट होने लगता है:

पति-पत्नी में झगड़े बढ़ते हैं
परिवार से दूरी बढ़ती है
व्यक्ति अकेला होने लगता है

क्योंकि उसके निर्णय अब उसके अपने नहीं रहते।

अगर वह अपने वास्तविक संबंधों को बचाने की कोशिश करता है, तो उसके भीतर मानसिक तनाव और असहनीय दबाव बढ़ता है। कभी कानों में कर्णपिशाचिनी जोर जोर से चिल्ला कर परेशान करती है , गला घोंट देती है.

पत्नी को बीमार कर देती है, लकवाग्रस्त कर देती है या तलाक कि नौबत ला देती है .

सपनों का अनुभव : वास्तविक घटना जैसा एहसास

इस साधना में सपनों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है।

एक अनुभव में मैंने कर्णपिशाचिनी का स्वप्न मन्त्र यूज किया था,  रात को मंत्र जप के बाद
कानों में हल्की फड़फड़ाहट शुरू हुई

धीरे-धीरे नींद और जागने के बीच की अवस्था आई फिर अचानक दृश्य बदला.

कुछ सेकंड के लिए एक आकृति दिखाई दी फिर दृश्य बदलकर एक मैदान, खेल, लोग- सब स्पष्ट दिखने लगा.

जागने के बाद भी वही कंपन, वही आवाजें बनी रहीं

अगले दिन जब वही दृश्य वास्तविकता में सामने आया तो यह अनुभव और भी गहरा हो गया कि सोने में जी घटनाएँ देखी थी वो अगले दिन घटित हुई.

लेकिन विश्लेषण करने पर समझ आया कि वह भविष्य नहीं था, बल्कि पहले से तय घटनाओं का मानसिक प्रोजेक्शन था। क्योंकि वो घटनाएँ एक आयोजन सम्बधित थी जो पूर्वनिर्धारित था.

शारीरिक प्रभाव

इस प्रकार के अनुभवों के बाद शरीर पर असर दिखता है:

तेज बुखार,शरीर में भारीपन, उल्टी और कमजोरी, मानसिक थकान.

मुझे खुद से सड़े हें मास जैसी बदबू आने लगी, नहाया लेकिन बदबू नहीं गई.

यह संकेत हैं कि नर्वस सिस्टम पर अत्यधिक दबाव पड़ा है।

मैंने कुछ वैदिक कवच आदि का पाठ किया तो बदबू बंद हुई.

शुरुआती सफलता और असली जाल

पहले कुछ वर्षों में व्यक्ति बहुत आगे निकलता हुआ लगता है:

लोग प्रभावित होते हैं, वह सब कुछ जानता हुआ प्रतीत होता है, उसकी प्रसिद्धि बढ़ती है.

लेकिन वास्तव में वह पूरी तरह नियंत्रित हो चुका होता है।

अंतिम चरण : भयावह पतन

समय के साथ:

मानसिक संतुलन बिगड़ता है, व्यक्ति अकेला हो जाता है, शरीर कमजोर पड़ने लगता है.

और फिर शुरू होता है सबसे भयावह चरण।

एक वास्तविक घटना : अंत का डरावना दृश्य

एक व्यक्ति तांत्रिक बाबा जिसने जीवन भर तंत्र-मंत्र से लोगों का इलाज किया, अंत में पूरी तरह टूट गया, उसने सबसे कहा था कि उसके पास काली कि सिद्धि है लेकिन वास्तविकता में उसके पास कर्ण पिशाचिनी की सिद्धि थी.

हर बार कर्ण पिशाचिनी मलमूत्र से काम नहीं करती है, उसकी सिद्धि वाम मार्गी तरीके से हो तो उसमें अपना मलमूत्र खाना पीना पड़ता है।

लेकिन अगर दक्षिण मार्गी तरीके से हो तो वो सिद्धि बिना मलमूत्र के होती है लेकिन अंत समय में पिशाचिनी बहुत ज्यादा मलमूत्र खिलाती है, शरीर में मलती है।

लास्ट का टाइम वो तांत्रिक पैरालाइज्ड हुआ, उसकी चलने, बोलने की कपैसिटी खत्म हो गई।

उसके चेलों ने उसे सम्भालना शुरू किया ।

कुछ महीनों बाद उसके कपड़ों में, बिस्तर में मल ही मल मिलने लगा, उसकी दुर्गन्ध इतनी तेज होती कि किसी से झेली नहीं जाती थी।

10-12 दिन तक तो चेलों ने उसे साफ कर दिया लेकिन जब उसके बालों में, मुँह में मल मिलने लगा तो उन्होंने उसे छोड़ दिया।

बोला उससे कुछ नहीं जाता था क्योंकि बोलने की कपैसिटी खत्म थी।

उसके लास्ट के कुछ दिन उसी तरह मलमूत्र में निकले।

वो चल भी नहीं पाता था, बस पड़ा रहता था।

एक दिन सुबह उसकी डैडबॉडी नदी के पास मिली, पूरी बॉडी में मल ही मल, नाक, मुँह,कान सब मल से भरे थे।

शायद पिशाचिनी उसे खींच घसीट के ले गई थी।

पानी के पास ये भूत प्रेत पिशाच ज्यादा ताकतवर होते हैं और मैक्सिमम ये बाथरूम या पानी वाली जगह के आसपास मारते हैं। गला घोंट के मार देना और सुसाइड करवाना, दोनों इनके मारने के मुख्य तरीके हैं।

अंतिम सत्य

कर्णपिशाचिनी जैसी साधनाएँ बाहर से शक्ति देती दिखती हैं , लेकिन अंदर से व्यक्ति को पूरी तरह तोड़ देती हैं.

यह ज्ञान नहीं देती, भ्रम देती है, यह नियंत्रण नहीं देती, गुलामी देती है.

निष्कर्ष

जो चीज सबसे ज्यादा आकर्षित करती है, वही सबसे ज्यादा खतरनाक होती है

इसलिए, इस मार्ग से दूर रहना ही सबसे बड़ा ज्ञान है.