इच्छा या जरूरत

इच्छा

इच्छा का अन्त नहीं है, लेकिन जरूरत पूरी हो जाती है। इच्छा पूरी होने पर दुःख का कारण भी बनती है।

गीता का संदेश

श्रीमद्भागवत गीता में कहा गया है -

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्र्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति।।

अध्याय 2 श्लोक 71

भावार्थ

जिस व्यक्ति ने इन्द्रियतृप्ति की समस्त इच्छाओं का परित्याग कर दिया है, जो इच्छाओं से रहित रहता है और जिसने सारी ममता त्याग दी है तथा अहंकार से रहित है, वही वास्तविक शान्ति प्राप्त कर सकता है।

जरूरत बनाम इच्छा का अंतर

भोजन आपकी जरूरत है, यह जरूरत पूरी हो जाएगी। लेकिन दुनिया की हर चीज खाना आपकी इच्छा हो सकती है, आवश्यक नहीं कि यह इच्छा पूरी हो जाए। आपको पैसा मिलता है और जरूरत पूरी हो जाती है तो अच्छा है, लेकिन जब पड़ोसी से ज्यादा पैसा पाने की इच्छा होती है तो मन और मस्तिष्क परेशान हो जाता है। पड़ोसी कुछ नहीं कर रहा, वह अपने गुण के अनुसार कमा रहा है। आपने उससे तुलना करके स्वयं के पैर पर कुल्हाड़ी मारी है, क्योंकि आपकी इच्छा जाग रही है ऊँचा उठने की। इसलिए अपनी जरूरत पूरी करें और इच्छा के रोग से बचें।

संतोष और असंतोष का अंतर

जरूरत पूरी होने पर संतोष मिल जाता है, लेकिन इच्छा क्या करती है, यह इन कहानियों से समझिए।

अल्लाहद्दीन का चिराग और जिन्न की कहानी

एक आदमी को अल्लाहद्दीन का जादुई चिराग मिल गया। उसने उसे रगड़ा तो उसमें से जिन्न निकल आया। जिन्न बोला कि मैं तुम्हारी तीन इच्छाएँ पूरी करूँगा, उसके बाद तुम्हारी जान ले लूँगा। आदमी ने कहा कि मुझे आज ही दस लाख रुपये चाहिए। जिन्न ने कहा कि शाम तक मिल जाएंगे।

शाम को एक व्यक्ति उसके घर आया और दरवाजा खटखटाया। दरवाजा खोलते ही उसने दस लाख रुपये से भरा बैग उसके हाथ में देते हुए कहा कि आपकी गाड़ी के नीचे आकर आपका बेटा मर गया। उसके बदले में यह रुपये देने आया हूँ। इतना सुनते ही वह आदमी बेहोश हो गया।

होश आने पर उसने जिन्न को बुलाया और दूसरी इच्छा जताई कि उसका बेटा उसे जीवित लौटा दिया जाए। जिन्न ने कहा कि शरीर बुरी तरह क्षत-विक्षत हो चुका है, इसलिए उसे जीवित करना कठिन है, लेकिन उसकी आत्मा को घर में ला सकता हूँ। थोड़ी ही देर में उसके बेटे की भटकती हुई आत्मा घर में आ गई, जो प्रेत बन चुकी थी। अब माता-पिता और अधिक परेशान हो गए। उन्होंने जिन्न से प्रार्थना की कि वह वहाँ से चला जाए। जिन्न चला गया, लेकिन कुछ समय बाद वापस आकर बोला कि तीनों इच्छाएँ पूरी हो चुकी हैं, अब तुम्हें मारना बाकी है। और उसने उन्हें मार दिया।

जीवन का कठोर सत्य

माता-पिता की मृत्यु जीवन का एक बड़ा सत्य है। एक लड़के ने भगवान से प्रार्थना की कि उसके माता-पिता जीवित रहें। भगवान ने उसकी इच्छा पूरी कर दी, लेकिन वह स्वयं अपने माता-पिता से पहले चल बसा। अब माता-पिता को जीवन भर अपने पुत्र की मृत्यु का दुःख सहना पड़ा।

हिमालय की जड़ी-बूटी की कहानी

एक सैनिक की ड्यूटी हिमालय क्षेत्र में लगी थी। वहाँ उसकी मुलाकात एक साधक से हुई, जिसने अपनी आयु आठ सौ वर्ष बताई। उसने बताया कि हिमालय में एक ऐसी जड़ी-बूटी है जिसे खाने से न बुढ़ापा आता है, न बीमारी और न मृत्यु। वर्ष में एक बार इसे लेना होता है, और जब मरने का मन हो तो इसे लेना बंद कर देना चाहिए।

सैनिक ने वह जड़ी-बूटी खाना शुरू कर दिया और हमेशा युवा बना रहा। उसकी पत्नियाँ बूढ़ी होती रहीं और वह नई शादियाँ करता गया। उसकी कई पीढ़ियाँ बढ़ती गईं, लेकिन उसकी जीवित रहने की इच्छा समाप्त नहीं हुई। सैकड़ों वर्षों बाद उसका विशाल परिवार फैल गया।

एक दिन जब वह जड़ी-बूटी लेने गया और लौटकर आया, तो उसने देखा कि एक मैदान में सैकड़ों शव जलाए जा रहे हैं। पास जाकर देखा तो वे सभी उसकी ही पीढ़ियों के लोग थे, जो एक महामारी में मर गए थे। यह दृश्य देखकर उसे गहरा सदमा लगा और वह इतना विचलित हो गया कि जड़ी-बूटी का ज्ञान ही भूल गया।

यदि वह सामान्य मृत्यु को स्वीकार करता, तो शायद इतना दुःख नहीं झेलता।

निष्कर्ष

इन सभी उदाहरणों से स्पष्ट है कि कुछ इच्छाएँ उचित होती हैं, लेकिन अनेक इच्छाएँ अनावश्यक और दुःख का कारण बनती हैं। इसलिए इच्छा से अधिक जरूरत को महत्व देना चाहिए।

भक्त प्रह्लाद ने भगवान से यही वर माँगा था कि उनकी सभी इच्छाएँ समाप्त हो जाएँ।

मृत्यु की पहचान

मृत्यु

यमराज के नाम से अधिकतर लोगों को डर ही लगता है, लेकिन अंत में उनके पास ही जाना है।


सुविचार

कर्म ही साथ जाता है।

विषय:- मृत्यु अकाट्य सत्य है।

धन संपत्ति आये या ना आये, लेकिन मृत्यु आनी ही है।
इसलिए स्वयं को तैयार रखना आवश्यक है।

मृत्यु इस जीवन का सबसे बड़ा सत्य है। पैदा हुए हैं तो मरना ही है।
सभी जानते हैं कि सबने मरना है। कुछ आजमाई हुई बातें आपके सामने लिख रहा हूँ जिससे आपको अपनी मृत्यु के समय का पता चल जायेगा।

बहुत से लोगों के बारे में आपने सुना होगा कि उन्हें मरने से पहले अपने फैल होने के कारण मौत आने का समय पता हो गया था।
यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। उन सब तक भी कोई न कोई रास्ता था।

संकेत (लक्षण)

[1] आपको अगर अपना नाक दिखाई देना बंद हो जाए तो 6 महीने में मृत्यु समझें।
[2] प्रत्यक्ष तारामंडल के बीच वाला तारा दिखना बंद हो जाये तो 6 महीने में मृत्यु समझें।
[3] जीभ निकालने पर जीभ ना दिखे तो 6 महीने में मृत्यु समझें।
[4] आँखों के संचालन में तकलीफ और धुंधला लगना लगे तो 6 महीने में मृत्यु समझें।
[5] शीशा देखने पर अपना चेहरा टेढ़ा-मेढ़ा या विकृत दिखने लगे तो 6 महीने में मृत्यु समझें।
[6] पानी या तेल में परछाई देखने पर उसमें छेद या दरार दिखने लगे तो 6 महीने में मृत्यु समझें।
[7] हाथ-पैर का संचालन बिगड़ने लगे और भोजन की मात्रा कम होने लगे तो 6 महीने में मृत्यु समझें।
[8] अपने मृत बुजुर्ग बार-बार नजर आने लगें या उनका एहसास होने लगे तो 3 महीने में मृत्यु समझें।
[9] नाक की दाईं या बाईं छिद्र में से कोई एक बिना बीमारी के लगातार 8-9 घंटे चलती रहे तो 3 महीने में मृत्यु समझें।
[10] अपनी परछाई अपने से दूर भागती हुई महसूस हो तो 3 महीने में मृत्यु समझें।
[11] किसी रोगी का मल-मूत्र छूट जाये और बैठना असमर्थ हो तो 7 दिन में मृत्यु समझें।
[12] चलते-चलते शरीर पर स्वयं लाल दाग पड़ने लगें तो 7-10 दिन में मृत्यु समझें।
[13] हृदय और नाड़ी की गति कभी तेज और कभी मंद चले तो 5 दिन में मृत्यु समझें।
[14] रोगी के चेहरे का मांस ढीला और लटकता हुआ लगे तथा चेहरा पीला पड़े तो 5 दिन में मृत्यु समझें।
[15] रोगी के हाथ-पैर काम करना बंद कर दें और पैरों में सूजन आये तो 5 दिन में मृत्यु समझें।
[16] रोगी के गले से घरघराहट की आवाज आने लगे और खांसी बढ़ जाये तो 3-7 दिन में मृत्यु समझें।
[17] रोगी के मुंह से सिर्फ “मां”, “हूं”, “आमा”, “अम्मा” जैसे शब्द निकलें तो 3 दिन में मृत्यु समझें।
[18] रोगी अगर जल बिल्कुल ही त्याग दे तो 2 दिन में मृत्यु समझें।
[19] दोनों कान बंद करने पर अगर एक कान की आवाज बंद हो जाये तो बड़ी विपत्ति का संकेत है। दोनों कानों की आवाज बंद हो जाये तो 3 दिन बाद मृत्यु निश्चित समझें।

इन लक्षणों में विज्ञान अधिक है। शरीर से संबंधित इसमें जीव विज्ञान है।

शरीर का जब भी कोई हिस्सा सही और सुचारु रूप से काम नहीं करता तो इसका मतलब यह होता है कि शरीर खराब हो रहा है और मृत्यु की तरफ जा रहा है।

आंखें सही तरीके से नहीं देख रही, दिमाग तक सही प्रतिविंब नहीं पहुंच रहा, नाक सही तरीके से काम नहीं कर रही, कान सही तरीके से काम नहीं कर रहे, पेट सही काम नहीं कर रहा, किडनी खराब हो रही है तो यह संकेत हैं कि शरीर धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बढ़ रहा है।

मृत्यु के लिए अपने मन और बुद्धि को तैयार करना चाहिए क्योंकि एक दिन सबको मरना है।
किसी को अपनी मौत का डर नहीं होना चाहिए।

हमारी मर्जी से मृत्यु नहीं होती, मृत्यु भगवान की मर्जी से होती है।
जीवन देना और लेना उसी के हाथ में है।

क्या न्याय के देवता शनिदेव आपके साथ अन्याय करते हैं?

शनिदेव

विषय:- सही होते हुए भी कानून काम क्यों नहीं आता है?

शनिदेव न्याय के देवता हैं, लेकिन सरल कानून का आपके प्रति दुरुपयोग हो जाता है जिसे आप रोक नहीं पाते।

शनिदेव को ज्योतिष में न्याय के देवता कहा गया है। कानून और न्याय शनिदेव के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। शनिदेव की एक टांग टूटी है इसलिए वे धीरे चलते हैं और न्याय व्यवस्था भी इसी कारण धीरे चलती है।

अक्सर पीड़ित लोग कानून को कोसते हैं क्योंकि न्याय प्रक्रिया इतनी धीमी होती है कि इंसान अंदर से टूट जाता है। अत्यधिक जघन्य अपराध के मामलों में स्पीडी ट्रायल किया जाता है लेकिन उस स्पीडी ट्रायल में भी कई साल लगते हैं, या स्पीडी ट्रायल भी स्लो मोशन जैसा फील देने लगता है।

लोग कानून का दुरुपयोग करते हैं जिसमें आम आदमी पीसा जाता है।
जैसे कि हत्यारा ही कानून का दुरुपयोग कर लेता है, नार्को टेस्ट के लिए इंकार कर देता है। नार्को टेस्ट से सच्चाई सामने आ सकती है लेकिन कानून कहता है कि बिना व्यक्ति की अनुमति के कोई उसके शरीर का बाल भी नहीं उखाड़ सकता है, तो फिर सोडियम पेन्टोथल जैसा केमिकल अपने शरीर में इंजेक्ट करने की अनुमति अपराधी क्यों दे जो उसे अपराधी साबित कर सकता है।

और यदि मान लीजिए कि जबरदस्ती नार्को टेस्ट कर दिया तो भी संविधान कहता है कि कोई व्यक्ति स्वयं के खिलाफ गवाही नहीं दे सकता। इस तरह से कानून का दुरुपयोग होता है जिसका खामियाजा पीड़ित व्यक्ति को उठाना पड़ता है।

क्या इस कारण से पीड़ित को इतना घाटा उठाना पड़ता है?
क्या शनिदेव जानबूझकर कानून को आपके खिलाफ कर देते हैं?

पहला तथ्य पूर्वजन्म का है कि यदि आपने किसी के साथ अन्याय किया था तो इस जन्म में शनिदेव आपको दंड देंगे और उसी कानून का दुरुपयोग आपके खिलाफ होगा।

एक सरल सा कानून आपके सहयोग का होता है जो किसी निश्चित काल के लिए आपके जीवन की सबसे बड़ी बाधा बन जाता है।

कानून में आरक्षण को देखें तो किसी के लिए वह वरदान है और किसी के लिए अभिशाप है। कानून व्यवस्था ही शत्रु बन जाती है। लेकिन जिसे आरक्षण का लाभ मिलता है वही व्यक्ति जब जज बन जाता है तो कानून से ही कमाता है।

वह कभी इस बात को नहीं सोचेगा कि आरक्षण उसके लिए श्राप है। ये सब पूर्वजन्म में कानून के दुरुपयोग का फल होता है कि इस जन्म में कानून आपके लिए ऐसी सजा बन जाता है कि आप हिरासत या जेल में नहीं होते लेकिन आपकी जिंदगी भी जेल जैसी लगती है।

दूसरा तथ्य रावण और शनिदेव की कहानी का है। रावण को नकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। रावण ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करके शनिदेव को अपने पैरों के नीचे दबाकर रखा था।

उसकी तुलना हम आज के भ्रष्ट लोगों से कर सकते हैं जो कि कानून को अपने पैरों तले दबाकर दूसरों को पीड़ित करते हैं। इस तथ्य में अंतर केवल इतना है कि उस समय रावण जैसा एक व्यक्ति था, आज ऐसे अनेक लोग हैं जो शनिदेव को अपने पैरों तले दबाने की मानसिकता रखते हैं।

लेकिन एक समय ऐसा भी आया कि हनुमान जी ने शनिदेव को रावण के पैरों के नीचे से आजाद कर दिया तथा उसके बाद रावण की लंका जल गई और उसके अंत की शुरुआत हो गई।

आज के समय में यदि किसी के साथ अन्याय हो रहा है तो वह अपने पूर्वजन्म का पाप भुगत रहा है या दूसरा उसे परेशान कर के स्वयं पाप कमा रहा है।

शनिदेव एक निष्पक्ष देवता हैं जिन्हें किसी से न अपनापन है न किसी से दुश्मनी। किसी के साथ कानूनी अन्याय हो रहा हो तो उपरोक्त दोनों तथ्यों में से कोई एक तथ्य उस पर लागू समझें और न्याय के लिए प्रयास करें।

कानून अंधा होता है लेकिन अंधों के लिए अंधा नहीं होता है। यदि आपको अन्याय हो रहा है तो अंततः भगवान आपको फल जरूर देंगे क्योंकि आप अन्याय को अपने जीवन का हिस्सा बना चुके हैं, दूसरे को स्वयं के साथ अन्याय करने की अनुमति दे चुके होते हैं।

कानून संबंधित समस्या जब भी हो तो शनिदेव के साथ हनुमान जी की पूजा जरूर करें।

ज्योतिष सूत्रों के आधार पर शनिदेव और हनुमान जी शत्रु हैं लेकिन हनुमान जी शनिदेव की मदद करते हैं और शनिदेव की मकर राशि में मंगल उच्च हो जाता है। मंगल के देवता हनुमान हैं और मकर के स्वामी शनिदेव।

हनुमान जी के गुरु सूर्यदेव के पुत्र शनि हैं, इसलिए अपने गुरु के पुत्र की मदद हनुमान जी करते हैं।

कानून व्यवस्था से पीड़ित होने पर हनुमान जी और शनिदेव की पूजा जरूर करें।

पाप कर्म ईश्वर कृपा में बाधक हैं।

कर्म

पाप कर्म ईश्वर के नजदीक नहीं आने देते, किसी न किसी तरह से दूरी बन जाती है।

विषय:- पापकर्म समाप्त होते ही ईश्वर कृपा की अनुभूति होती है।

ईश्वर के द्वार में लोगों की भीड़ लगी रहती है। उन्हें क्या मिलता है वहाँ घंटों तक पंक्ति में खड़े रहने से? क्यों लोग सैकड़ों किलोमीटर दूर से काँवड़ में गंगाजल भरकर ले जाते हैं? भगवान उन्हें क्या दे देता है?

ऐसे बहुत से सवाल उन लोगों के मन में आ जाते हैं जो लगभग नास्तिक प्रवृत्ति के होते हैं। नास्तिकता बुरी चीज नहीं है, नास्तिक लोग आँखों देखी चीजों पर विश्वास करते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण जी ने श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है कि मुझे चर्मचक्षुओं से नहीं देखा जा सकता है। मुझे देखने के लिए दिव्य दृष्टि की आवश्यकता है, जो तभी मिलती है जब मैं चाहता हूँ। मानव नेत्र से ईश्वर को देख पाना तभी संभव है जब ईश्वर स्वयं चाहें।

ईश्वर को देखने वाला व्यक्ति मछली में भी मत्स्यावतार की कल्पना कर लेता है और सूर्य को देखकर भी ईश्वर के साक्षात होने का प्रमाण मान लेता है। लेकिन जब तक ईश्वर नहीं चाहता, तब तक इस प्रकार के विचार भी मन में नहीं आ पाते।

कुछ लोग ईश्वर पर विश्वास करते हैं लेकिन फिर भी भगवान उन्हें नहीं सुनता है, ऐसा क्यों?

जब तक मनुष्य के पापकर्म समाप्त नहीं हो जाते, तब तक ईश्वर कृपा प्राप्त नहीं होती।

संत श्री तुलसीदास जी ने जब भगवान श्रीराम जी को ढूंढना चाहा, तो बाबूल के पेड़ पर लटके प्रेत ने कहा कि मैं तुम्हें भगवान राम से मिलने का रास्ता बताता हूँ।

प्रेत ने कहा, जहाँ भी श्रीराम कथा होती है, वहाँ सबसे पहले हनुमान जी आते हैं और सबसे बाद में जाते हैं। उनके चरण पकड़ लेना और कहना कि भगवान श्रीराम जी के दर्शन करवा दो। हनुमान जी दर्शन करवा देंगे।

तुलसीदास जी ने कहा कि ओ भले मानस, तुझे इतना ही ज्ञान है राम जी के दर्शन का, तो खुद दर्शन क्यों नहीं कर लेता?

प्रेत ने कहा , मैं पापकर्मों के कारण प्रेत बनकर भटक रहा हूँ। जब पापकर्म समाप्त होंगे, तब सबसे पहले हनुमान जी की शरण में जाऊँगा, श्रीराम जी के दर्शन करूंगा। लेकिन जब तक पापकर्म हैं, मैं ईश्वर के पास नहीं जा सकता। ये पापकर्म मेरे हैं, ईश्वर के नहीं।

इसी प्रकार एक ईश्वर भक्त मंदिर जाता था। अक्सर उसकी बारी आने पर प्रसाद समाप्त हो जाता था।

एक दिन वह दुखी होकर पुजारी से बोला कि आप प्रसाद थोड़ा अधिक बनाया करो। मैं मंदिर आता हूँ लेकिन मुझे मिलने से पहले ही प्रसाद समाप्त हो जाता है।

पुजारी ने अगले दिन अधिक प्रसाद बनाया, लेकिन उस व्यक्ति की बारी आने से पहले ही प्रसाद समाप्त हो गया। ऐसा कई दिन तक चलता रहा।

एक दिन वह व्यक्ति बोला, भगवान, तुम ऐसा क्यों करते हो? मैं आप पर बड़ी श्रद्धा रखता हूँ, फिर प्रसाद नसीब में क्यों नहीं है?

रात को उसे स्वप्न में भगवान ने दर्शन दिए और कहा,
जब तक तुम्हारे पापकर्म समाप्त नहीं हो जाते, तब तक किसी न किसी रूप में तुम्हें मेरी कृपा प्राप्त होने में रुकावट आती रहेगी।

पाप अधिक है तो प्रसाद भी नसीब नहीं होता। तुम्हें दर्शन हो रहे हैं, वही बड़ी बात है।

जो मंदिर जाते हैं, काँवड़ में जल उठाकर सैकड़ों किलोमीटर दूर जाकर शिवजी का अभिषेक करवाते हैं, वे इसलिए करवाते हैं क्योंकि उन्होंने ईश्वर को महसूस किया है।

वह एहसास ही उन्हें सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने की शक्ति देता है।

प्रारब्ध अकाट्य है।

डेस्टिनी

प्रारब्ध को नहीं बदला जा सकता है, सिर्फ कुछ हद तक फेरबदल सम्भव हो सकता है।

सुविचार -
प्रारब्ध के आगे मनुष्य विवश है।

विषय:- प्रारब्ध ईश्वर ने हमारे कर्मों के अनुसार ही रचा है।

पहले प्रारब्ध रचा, पाछे रचा शरीर।

तुलसी चिन्ता क्यों करे, भज ले तू रघुवीर।

पुरुष उसका सन नहीं रहा था उसकी ही गर्मे में स्त्री ने अपने पति की तलवार से पति की गर्दन काट दी और अपने कपड़े फाड़ के जोर जोर से चिल्लाने लगी कि लूट गई, बर्बाद हो गई, इस पति को मार डाला। लोग इकट्ठे हो गए, सबने मिलकर उस शरीफ इंसान को पीटा, और पंचायत ने उसके दोनों हाथ काट दिए।

बचारा जैसे तैसे जीवन चला। कुछ समय बाद वो एक ज्योतिषी के पास गया और बोला कि महाराज ज्योतिष में गणना लगाइए कि मेरे साथ ये क्या हो गया और क्यों हो गया, कुछ समाधान निकालिए।

ज्योतिषी ने कहा कि अपने समाधान पूछने आया है और इधर आप खुद मार खा रहे हो। पहले अपना समाधान कर लो फिर अपने सवाल का।

ज्योतिषी ने कहा कि तुम पिछले जन्म में साधु थे, सैनिक एक कसाई था और स्त्री गाय थी। कसाई गाय को मारने के लिए दौड़ रहा था और गाय जान बचाने को भाग रही थी। तुमने अपने हाथों से उस गाय को पकड़कर नीचे गिरा दिया जिससे कसाई ने उसकी गर्दन काट दी।

अब वर्तमान जन्म में वही स्त्री पत्नी बनी, कसाई सैनिक बना, और तुम्हारे हाथ काट दिए गए। जिस अंग से पाप किया उसी अंग से दंड मिला।

प्रारब्ध अकाट्य है। जन्मकुंडली में जो प्रारब्ध लिखा होता है वह इस जन्म में भोगना ही पड़ता है। जो फल कर्मों के अनुसार बनते हैं, वे बदल नहीं सकते।

हमारे जीवन का लगभग 65% हिस्सा ऐसा होता है जिसे बदलना संभव नहीं होता। बाकी 35% कर्म करने के लिए स्वतंत्रता है।

यही 65% अकाट्य हिस्सा है जो बदलता नहीं है, उसे प्रारब्ध कहते हैं।

यह प्रश्न युधिष्ठिर से पूछा गया कि भाग्य क्या होता है?
युधिष्ठिर ने कहा — कर्म के फल को ही भाग्य कहते हैं।

भीष्म पितामह को बाणों की शैय्या मिली क्योंकि उन्होंने पिछले जन्म में एक सांप को कंटीली झाड़ी पर फेंक दिया था।

इस पाप के फलस्वरूप उन्हें बाणों की शैय्या पर लेटना पड़ा। यह प्रारब्ध है, जिसे काटने में आधा जीवन या पूरा जीवन भी लग सकता है।

एक बार एक सीधा सादा व्यक्ति भगवान के दर्शन के लिए यात्रा पर जा रहा था। रास्ते में किसी सैनिक के घर में रुक गया। सैनिक शराबी था। रात को उसने अपनी पत्नी को शराब पिलाई और उसे पीटा।

पत्नी ने कहा कि भाग जाओ नहीं तो मार डालेगा। वह व्यक्ति भागा और बच गया।

लेकिन बाद में उसे समझ आया कि ये सब भी प्रारब्ध का ही हिस्सा था।

कई बार भगवान भी प्रारब्ध नहीं बदलते।

जैसे — नारद जी ने विष्णु जी से कहा कि मुझे सुंदर बना दो, लेकिन उन्हें वानर रूप मिला।

भगवान राम के जीवन में भी प्रारब्ध था — सीता हरण हुआ, वनवास मिला।

इसलिए प्रारब्ध को समझना चाहिए।

35% स्वतंत्रता भगवान ने दी है, उसमें अच्छे कर्म करने चाहिए।

कुंडली से इष्टदेव/इष्टदेवी

इष्ट

क्या भक्ति ईश्वर को जन्मकुंडली के अनुसार मानना चाहिए?

विषय:- कुंडली के अनुसार इष्टदेवी/इष्टदेव सही है या आपकी भक्ति भावना के अनुसार सही है।

सुविचार -
जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।

जेहि के जेहि पर सत्य सनेह, सो तेहि मिलहि न कछु सन्देह।

कुंडली दिखाते समय कुछ लोग एक बात बार-बार पूछते हैं कि कुंडली से हमारे इष्टदेव/इष्टदेवी बता दो कौन हैं? कोई बहुत ज्यादा ईश्वर वाला व्यक्ति तो नहीं होता लेकिन बहुत लोग अपने इस सवाल को जानना चाहते हैं।

ज्योतिषियों को कोई ना कोई मिल ही जाता है। सभी भगवान को किसी ना किसी रूप में मानते हैं। कोई साकार तो कोई निराकार में मानता है। सभी का अपना-अपना दृष्टिकोण होता है।

ज्योतिष का नियम ये कहता है कि जन्म कुंडली में पंचम भाव में स्थित ग्रहों और राशि के अनुसार इष्ट देव या देवी का चयन किया जाता है। कुछ करते हैं कि हम अपने ईष्ट को कैसे पहचानें?

नियम अनुसार ग्रहों से इष्ट देव:

सूर्य – विष्णु तथा राम
चंद्र – शिव, पार्वती, कृष्ण
मंगल – हनुमान, कार्तिकेय, स्कन्द
बुध – दुर्गा, गणेश
गुरु – ब्रह्मा, विष्णु, वामन
शुक्र – लक्ष्मी, मां गौरी
शनि – भैरव, यम, हनुमान, कूर्म
राहु – सरस्वती, शेषनाग, भैरव
केतु – गणेश, मत्स्य

राशि अनुसार इष्ट:

मेष – सूर्य, विष्णु
वृष – गणेश
मिथुन – सरस्वती, तारा, लक्ष्मी
कर्क – हनुमान
सिंह – शिव
कन्या – भैरव, हनुमान, काली
तुला – भैरव, हनुमान, काली
वृश्चिक – शिव
धनु – हनुमान
मकर – सरस्वती, तारा, लक्ष्मी
कुंभ – गणेश
मीन – दुर्गा, सीता

कुछ लोग अपनी कुंडली के अनुसार इष्ट जानना चाहते हैं ताकि जल्दी फल मिले, लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है।

तुलसीदास जी ने कहा है –
जाकी रही भावना जैसी,
प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।

श्रीमद्भगवद गीता में लिखा है –
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्।।
(अध्याय 7, श्लोक 21-22)

अर्थ:
जो भी भक्त जिस देवता को श्रद्धा से पूजना चाहता है, मैं उसकी श्रद्धा को उसी देवता में स्थिर कर देता हूँ।

इसका अर्थ है कि भक्ति का आधार श्रद्धा और भावना है, केवल कुंडली नहीं।

हर व्यक्ति अपने भाव से ईश्वर को प्राप्त कर सकता है।

निष्कर्ष:

आप जिस देवता में सच्ची श्रद्धा रखते हैं, वही आपके लिए सही इष्ट हैं।

देव पंचायतन: शास्त्रीय आधार और जीवन में संतुलन का विज्ञान

पंचायत

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देव पंचायतन: शास्त्रीय आधार और जीवन में संतुलन का विज्ञान

परिचय

हिंदू उपासना पद्धति में “देव पंचायतन” केवल एक पूजा-विधि नहीं, बल्कि एक गहन दार्शनिक व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य मनुष्य के जीवन में संतुलन स्थापित करना है। “पंचायतन” शब्द का अर्थ है—पाँच देवताओं का समूह। यह परंपरा विशेष रूप से आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित की गई, ताकि विभिन्न मतों और उपासना पद्धतियों के बीच समन्वय बना रहे।

इस व्यवस्था का मूल भाव यह है कि ईश्वर एक ही है, परंतु उसकी अभिव्यक्ति विभिन्न रूपों में होती है।

पंचायतन का शास्त्रीय आधार

शास्त्रों में पंचदेव उपासना को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।

आदित्यं गणनाथं च देवी रुद्रं च केशवम्।
पञ्चदैवत्यपूजां यः कुरुते स न संशयः॥”

इस श्लोक में स्पष्ट कहा गया है कि सूर्य, गणेश, देवी, रुद्र और केशव-इन पाँचों की संयुक्त पूजा करने वाला साधक निश्चित रूप से श्रेष्ठ फल प्राप्त करता है।

इसी भाव को ऋग्वेद में भी कहा गया है—

एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति”
अर्थात सत्य एक है, ज्ञानी उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।

यह सिद्धांत देव पंचायतन की जड़ में स्थित है।

पंचदेव और उनका अर्थ

देव पंचायतन में पाँच देवता शामिल होते हैं-शिव, विष्णु, गणेश, सूर्य और शक्ति। ये केवल देवता नहीं, बल्कि जीवन की पाँच मूल ऊर्जाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।

शिव परिवर्तन और अंतर्मुखी शक्ति के प्रतीक हैं।
विष्णु संतुलन और पालन के आधार हैं।
गणेश बुद्धि और विघ्नों को दूर करने की शक्ति देते हैं।
सूर्य जीवन ऊर्जा और स्वास्थ्य का स्रोत हैं।
शक्ति रक्षा, सामर्थ्य और सक्रिय ऊर्जा का रूप हैं।

इन पाँचों की उपासना मिलकर जीवन के हर पक्ष को संतुलित करती है।

इष्ट देव और पंचायतन का संबंध

देव पंचायतन की एक विशेषता यह है कि इसमें साधक अपने इष्ट देव को केंद्र में रख सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि अन्य देवता गौण हो जाते हैं, बल्कि यह दर्शाता है कि सभी देव एक ही परम तत्व के विभिन्न रूप हैं।

“यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥”

 
भगवद्गीता (7.21)

अर्थ:
भक्त जिस देवता की श्रद्धा से पूजा करना चाहता है, मैं उसकी श्रद्धा उसी में स्थिर कर देता हूँ।

अर्थात भक्त जिस रूप में श्रद्धा करता है, उसी में उसकी आस्था स्थिर हो जाती है, परंतु फल देने वाला एक ही परमात्मा है।

पूजा स्थान में पंचायतन का महत्व

घर के पूजा स्थान में देव पंचायतन की स्थापना करने से केवल धार्मिक लाभ ही नहीं, बल्कि मानसिक और ऊर्जात्मक संतुलन भी प्राप्त होता है।

  • सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण होता है
  • निर्णय क्षमता और मानसिक स्थिरता बढ़ती है
  • जीवन में संतुलन और स्पष्टता आती है

यह व्यवस्था व्यक्ति को एक ही दिशा में नहीं, बल्कि समग्र रूप से विकसित करती है।

मुख्य समझ (Essential Insight)

देव पंचायतन हमें यह सिखाता है कि जीवन को संतुलित रखने के लिए केवल एक पक्ष पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है।

  • केवल बुद्धि पर्याप्त नहीं (गणेश)
  • केवल शक्ति पर्याप्त नहीं (दुर्गा)
  • केवल भक्ति पर्याप्त नहीं (विष्णु)

संतुलन ही पूर्णता है, और यही पंचायतन का सार है।

निष्कर्ष

देव पंचायतन एक ऐसी उपासना पद्धति है जो मनुष्य को एकांगी नहीं, बल्कि समग्र बनाती है। यह केवल पूजा का तरीका नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक संतुलित दृष्टि है।

जब साधक इन पाँचों शक्तियों को अपने जीवन में स्थान देता है, तब उसका जीवन अधिक स्थिर, स्पष्ट और उन्नत होता है।

अंतिम संदेश

यदि आप अपने जीवन में संतुलन, शांति और प्रगति चाहते हैं, तो केवल पूजा न करें-
समझ के साथ पूजा करें, और पंचायतन का भाव अपनाएँ।

कर्मफल अकाट्य है।

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कर्म इंसान के अधिकार में है, उसका फल देना ईश्वर के अधिकार में है।

AstroPine™

विषय:- कर्म प्रधान विश्व रची राखा।

जैसा कर्म करेंगे, वैसा फल मिलेगा।

शुद्ध रूप से सोच समझ कर निर्णय किया लेकिन फिर भी सीता का हरण हुआ, दशरथ की मृत्यु हुई और वनवास भोगना पड़ा। सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र ने हमेशा सत्य कहा लेकिन फिर भी नीच कलर डोम के हाथों बिके, मुर्दे जलाए तथा उसके घर में नौकर बनकर पानी भरा। राजा बनने के लिए अपने पुण्य कर्मों का सारा दान कर दिया लेकिन अंत में पाताल की प्राप्ति हुई। राजा नृग ने 1 करोड़ गायें दान कर दीं जिनमें गलती से एक ब्राह्मण की गाय दूसरे को दे दी। जब ब्राह्मण ने दूसरे ब्राह्मण के पास अपनी गाय पहचानी तो राजा ने मिलना चाहा कि आपने गलती से मेरी गाय ले ली है और बदले में दान कर दी। राजा ने तीनों के चरण पकड़कर क्षमा मांगी, लेकिन ब्राह्मण ने शाप देकर राजा को गिरगिट बना दिया। 1 करोड़ गायों का दान भी काम नहीं आया और राजा को गिरगिट बनना पड़ा।

पाण्डवों के मित्र, सारथी थे भगवान कृष्ण, लेकिन उन्हें भी पत्नी का अपमान झेलना पड़ा, राज्य खोया, वनवास गए, गुरु, दादा, पाण्डव द्रोपदी समेत युद्ध में गिरकर मरे। भगवान श्रीकृष्ण ने पाण्डवों के पापों के उद्धार के लिए घमण्ड चूर करवाया, लेकिन फिर भी भगवान श्रीकृष्ण का सारा वंश समाप्त हो गया। सूर्य देव और चन्द्रमा तक ग्रहण लगते हैं। इसे न रोका जा सकता है और न बदला जा सकता है।

कबीर ने कहा है कि कर्म की गति को कोई नहीं बदल सकता, कर्म के फल मिलकर ही रहते हैं और होते ही रहेंगे।

मण्डी, हिमाचल प्रदेश

कर्म प्रधान विश्व रची राखा।
जस जस भाव कर्म करैंगा,
तस तस भाव कर्मफल चाखा।।

लोगों के मन में गलतफहमी रहती है कि एस्ट्रोलॉजर कुछ हद तक बदल सकता है, जबकि सत्य कुछ और ही होता है। आपके खराब वक्त में आप कोई भी उपाय कर लीजिए, आपको तकलीफ होनी ही है। संसार में जो भी मनुष्य पैदा हुआ है उसे अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। कोई कितना भाग सकता है? जब तक कर्म भोग कर खत्म नहीं हो जाता तब तक कोई इससे नहीं बच सकता। चाहे आप कितना ही बड़ा उपाय या अनुष्ठान क्यों न कर लें।

कबीर ने कहा -

कर्म गति टारे नहीं टरी।
मुनि वशिष्ठ से पंडित ज्ञानी,
शोध के लान धरी।
सीता हरण, मरन दशरथ को,
वन में विपत्ति पड़ी।
नीच घर नीर भरावन हरिचंद,
बली पाताल धरी।
कोटि गाय नित पुण्य करत,
नृग गिरगिट जोन परी।
पाण्डव जिनके आप सारथी,
तिन पर विपत पड़ी।
दुर्योधन का गर्व घटायो,
यदुकुल नाश करी।
राहु केतु भानु चन्द्रमा,
विधि संजोग परी।
कहत कबीर सुनो रे भाई साधो,
होनी हो के रही।

अर्थ -

कर्म की गति चाह कर भी नहीं टाली जा सकती। श्रेष्ठ मुनि वशिष्ठ ने भगवान श्री राम और सीता का विवाह लग्न बहुत शुभ देखा, फिर भी सीता का हरण हुआ और दशरथ की मृत्यु हुई। सत्यवादी हरिश्चन्द्र को नीच घर में पानी भरना पड़ा। राजा बलि पाताल गए। राजा नृग को गिरगिट बनना पड़ा। पाण्डवों को कष्ट सहना पड़ा। दुर्योधन का गर्व टूटा और यदुवंश समाप्त हुआ। सूर्य और चन्द्रमा तक ग्रहण लगते हैं।

मीराबाई ने कहा -

कर्म गति टारे नहीं टरी।
सतवादी हरिचंद से राजा,
नीच घर नीर भरी।
पाँच पाण्डव अरु सती द्रौपदी,
हाड़ हिमालय भरी।
दुर्जन जनम लिया इन्द्रासन,
सूर पाताल धरी।

तुलसीदास जी का कथन -

विश्व कर्म प्रधान है और जिस भावना से कर्म किया जाता है उसी प्रकार फल मिलता है।

अंतिम विचार

अपने पूर्व जन्म के अच्छे-बुरे कर्मों को हम नहीं जानते हैं। जब हमें बुरे कर्मों का फल मिलता है तो ऐसी स्थिति होती है जैसे कि गरम रोटी गले में फंस जाती है। न उसे उगल सकते हैं और न निगल सकते हैं।

लेकिन यदि हम भगवान का नाम लेते हैं तो वह कष्ट कम हो सकता है। कर्मफल का बोझ तो उठाना ही पड़ेगा—चाहे समझ कर उठाएँ या रोकर उठाएँ।

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किस्मत को बदलने का सबसे सरल और प्रभावी तरीका है—अपने कर्मों को बदलना।