छोटा स्वार्थ बड़े पुण्यों का विनाश कर देता है

कर्म

एक गहन आध्यात्मिक दृष्टिकोण

“लघु स्वार्थप्रयोजनानि बृहत्गुणान् नाशयन्ति।
एतादृशं कर्म कृत्वा लोके अल्पकालं यावत् यशः नाम च प्राप्नोति,
परन्तु परलोके दीर्घकालं यातनाः प्राप्यते।”

मनुष्य जीवन केवल भौतिक उपलब्धियों का साधन नहीं, अपितु आत्मोन्नति और धर्मपालन का एक दिव्य अवसर है। प्रस्तुत श्लोक अत्यंत सूक्ष्म किन्तु गहन सत्य को उद्घाटित करता है—कि छोटे-छोटे स्वार्थ, जिनका आकर्षण तत्काल सुख और लाभ में होता है, वे व्यक्ति के भीतर स्थित महान गुणों का धीरे-धीरे नाश कर देते हैं। यह नाश बाह्य रूप से तुरंत दिखाई नहीं देता, परन्तु भीतर का तेज, सदाचार, और पुण्य क्षीण होने लगता है।

स्वार्थ की सूक्ष्मता और उसका प्रभाव

स्वार्थ सदैव स्पष्ट रूप से प्रकट नहीं होता। वह अनेक बार उचित कारणों, सामाजिक दबावों, अथवा व्यक्तिगत लाभ के रूप में स्वयं को उचित ठहराता है। व्यक्ति सोचता है कि एक छोटा सा अनुचित कार्य कोई बड़ा प्रभाव नहीं डालेगा। किन्तु यही ‘लघु स्वार्थ’ धीरे-धीरे आदत का रूप ले लेता है और अंततः व्यक्ति के चरित्र को परिवर्तित कर देता है। सत्य, करुणा, और त्याग जैसे बृहत् गुण, जो आत्मा की उन्नति के आधार हैं, स्वार्थ के स्पर्श मात्र से मुरझाने लगते हैं।

क्षणिक यश बनाम शाश्वत परिणाम

यह श्लोक स्पष्ट करता है कि ऐसे कर्मों से व्यक्ति को लोक में अल्पकाल के लिए यश और प्रसिद्धि प्राप्त हो सकती है। समाज प्रायः बाह्य परिणामों को देखता है, न कि उनके पीछे छिपे नैतिक आधार को। इसलिए कभी-कभी स्वार्थपूर्ण कर्म भी सफलता का रूप धारण कर लेते हैं। परन्तु यह यश क्षणभंगुर है—समय के साथ उसका प्रभाव समाप्त हो जाता है, और व्यक्ति को उसके वास्तविक कर्मों का फल भोगना पड़ता है।

“अल्पकालं यावत् यशः नाम च प्राप्नोति…”
यह पंक्ति इस सत्य को दर्शाती है कि सांसारिक यश स्थायी नहीं होता। वह केवल एक भ्रम है, जो समय के प्रवाह में विलीन हो जाता है।

परलोक और कर्मफल का सिद्धांत

भारतीय दर्शन में कर्म और उसके फल का सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रत्येक कर्म, चाहे वह सूक्ष्म ही क्यों न हो, उसका फल निश्चित रूप से प्राप्त होता है। जब व्यक्ति स्वार्थ वश अधर्म का मार्ग अपनाता है, तो वह केवल वर्तमान जीवन को नहीं, बल्कि अपने भविष्य और परलोक को भी प्रभावित करता है।

“परन्तु परलोके दीर्घकालं यातनाः प्राप्यते।”
यह चेतावनी है कि स्वार्थ पूर्ण कर्मों का परिणाम दीर्घकालिक कष्ट के रूप में सामने आता है। यह कष्ट केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर भी अनुभव होता है। आत्मा, जो मूलतः शुद्ध और प्रकाशमय है, अधर्म के कारण बंधनों में जकड़ जाती है।

भक्त दुखी क्यों होते हैं, और दुष्ट सुखी क्यों दिखते हैंI

सुख दुःख

श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-
यस्याहमनुगृह्णामि हरिष्ये तद्धनं शनैः।
ततोऽधनं त्यजन्त्यस्य स्वजनाः दुःखदुःखितम्॥ (10.88.8)

अर्थ: जिस पर मैं विशेष कृपा करता हूँ, उसका धन धीरे-धीरे छीन लेता हूँ। जब वह निर्धन हो जाता है, तो उसके अपने भी उसे छोड़ देते हैं और वह दुखी होता है।

इस श्लोक का अर्थ बहुत गहरा है। सामान्य दृष्टि से यह कठोर प्रतीत होता है, परंतु वास्तव में यही ईश्वर की सर्वोच्च करुणा का रूप है। मनुष्य जब धन, प्रतिष्ठा, संबंध और बाहरी सुखों में उलझ जाता है, तब उसका मन ईश्वर से दूर हो जाता है और वह अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है। भगवान जब किसी पर विशेष कृपा करते हैं, तो वे उसके झूठे सहारों को तोड़ते हैं, ताकि वह भीतर की ओर मुड़े और आत्मा तथा परम सत्य का अनुभव कर सके। इसलिए भक्त के जीवन में आने वाला दुख वास्तव में पतन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति की शुरुआत होता है।

श्रीमद्भगवद्गीता में इस स्थिति को और स्पष्ट करते हुए कहा गया है-
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥ (2.14)

अर्थ: इंद्रियों के विषयों से उत्पन्न सुख और दुख अस्थायी हैं, वे आते-जाते रहते हैं; इसलिए उन्हें धैर्यपूर्वक सहन करना चाहिए।

यहाँ भगवान यह समझाते हैं कि दुख स्थायी नहीं होता, वह केवल एक अस्थायी अवस्था है। भक्त इस सत्य को समझकर दुख से विचलित नहीं होता, बल्कि उसे सहन करता है और उससे सीखता है। यही सहनशीलता धीरे-धीरे उसके भीतर वैराग्य उत्पन्न करती है। जब बार-बार जीवन में असफलताएँ आती हैं और अपेक्षाएँ टूटती हैं, तब मनुष्य को संसार की नश्वरता का अनुभव होता है और उसका झुकाव भक्ति की ओर होने लगता है।

इसी भाव को आगे श्रीमद्भागवत महापुराण में कहा गया है-
तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो
भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्।
हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते
जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक्॥ (10.14.8)

अर्थ: जो व्यक्ति अपने कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त दुख को भी भगवान की कृपा मानकर सहन करता है और मन, वाणी तथा शरीर से भगवान को प्रणाम करता है, वह मुक्ति का अधिकारी बन जाता है।

यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भक्त दुख को विरोध नहीं करता, बल्कि उसे स्वीकार करता है। वह यह समझता है कि यह उसके ही कर्मों का परिणाम है और भगवान की कृपा से ही वह इसका भोग कर रहा है। यही दृष्टिकोण उसे आंतरिक शांति देता है और धीरे-धीरे उसे ईश्वर के निकट ले जाता है।

अब दूसरी ओर देखें तो श्रीमद्भगवद्गीता में कर्म की गहनता को बताते हुए कहा गया है-
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥ (4.17)

अर्थ: कर्म, विकर्म और अकर्म—इन सबको समझना चाहिए, क्योंकि कर्म की गति अत्यंत गहन है।

इसका अर्थ यह है कि जो हम वर्तमान में देख रहे हैं, वह पूरी कहानी नहीं है। दुष्ट व्यक्ति का सुख उसके वर्तमान कर्मों का परिणाम नहीं होता, बल्कि उसके पूर्व संचित पुण्यों का फल होता है। इसलिए वह बाहर से सुखी, समृद्ध और सफल दिखाई देता है, लेकिन यह स्थिति स्थायी नहीं होती।

इसी सत्य को आगे गीता में स्पष्ट किया गया है-
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं
क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना
गतागतं कामकामा लभन्ते॥ (9.21)

अर्थ: जब पुण्य समाप्त हो जाते हैं, तब व्यक्ति पुनः नीचे गिरता है और जन्म-मरण के चक्र में लौट आता है।

अर्थात् दुष्ट व्यक्ति पहले अपने पुण्यों का भोग करता है और जब वे समाप्त हो जाते हैं, तब उसके पाप कर्मों का फल प्रारंभ होता है, जो प्रायः अधिक कष्टदायक होता है। यही कारण है कि उसका प्रारंभ सुखमय और अंत दुःखमय होता है।

इसके साथ ही गीता यह भी स्पष्ट करती है-
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥ (2.66)

अर्थ: जिसके भीतर शांति नहीं है, उसे वास्तविक सुख कभी प्राप्त नहीं हो सकता।

इसका सीधा अर्थ है कि दुष्ट व्यक्ति का सुख केवल बाहरी होता है, भीतर से वह अशांत और भयभीत रहता है। इसके विपरीत, भक्त का जीवन भले ही संघर्षपूर्ण हो, लेकिन उसके भीतर संतोष और ईश्वर का विश्वास होता है, जो उसे स्थिर बनाए रखता है।

अंत में भगवान का यह वचन इस पूरे विषय का निष्कर्ष प्रस्तुत करता है-
न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति॥ (6.40)

अर्थ: जो व्यक्ति शुभ कर्म करता है, उसका कभी बुरा अंत नहीं होता।

इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भक्त का दुख वास्तव में उसके उत्थान की प्रक्रिया है, जबकि दुष्ट का सुख उसके पतन की प्रस्तावना है। भगवान इस सृष्टि में पूर्ण न्याय और संतुलन बनाए रखते हैं; वे किसी के साथ अन्याय नहीं करते, बल्कि प्रत्येक को उसके कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं। जब यह दृष्टि मनुष्य में विकसित हो जाती है, तब वह जीवन की परिस्थितियों से भ्रमित नहीं होता, बल्कि उन्हें ईश्वर की योजना का हिस्सा मानकर स्वीकार करता है और अपने मार्ग पर स्थिर रहता है।

झूठ बोलकर कमाया धन

धन

झूठ से कमाया धन और उसका परिणाम

आपने झूठ बोलकर कमाया है तो वह पैसा या लाभ आपको बहुत ज्यादा दुःख देकर समाप्त होगा। यह केवल एक सामान्य कथन नहीं है, बल्कि जीवन और ज्योतिष के गहरे अनुभवों से निकला हुआ सत्य है, जो समय आने पर अपने प्रभाव को अवश्य दिखाता है।

द्वितीय भाव का महत्व और उसका प्रभाव

कुण्डली में द्वितीय भाव वाणी तथा धन संचय का होता है। यह भाव केवल धन के आने का संकेत नहीं देता, बल्कि यह भी बताता है कि वह धन किस प्रकार से अर्जित हुआ है और वह टिकेगा या नष्ट होगा।

एक्सपीरियंस के आधार पर कुछ बातें स्पष्ट रूप से सामने आती हैं। आपकी वाणी भले ही कड़वी हो, लेकिन यदि वह सच्ची है तो किसी की मजाल नहीं कि आपका चवन्नी का भी नुकसान कर जाए या आपका धन व्यर्थ हो जाए। सत्य की शक्ति धीरे काम करती है, लेकिन स्थायी होती है।

सत्य और असत्य की वाणी का अंतर

मीठी वाणी यदि झूठी है, तो आप जितना भी अपना पैसा बचाने की कोशिश करें, जितना भी पूजा पाठ कर लें, उस झूठ से मिले धन को संचय नहीं कर सकते। वह धन किसी न किसी रूप में आपसे निकल ही जाएगा।

वह धन बीमारी या दुर्घटना में खर्च हो जाएगा। कोई आपसे मांगे तो आप मुकर सकते हैं, लेकिन जब शरीर टूटेगा तो धन निकालना ही पड़ेगा। यही कर्म का संतुलन है जो किसी भी रूप में पूरा होता है।

ईमानदारी से कमाया धन कभी नहीं जाता

आपका धन यदि ईमानदारी का है और आपने उसे सच बोलकर कमाया है, तो वह आपको छोड़कर नहीं जाएगा। यदि किसी ने उधार लिया है, तो वह सही समय पर और सही सलामत वापस आएगा।

द्वितीय भाव में शुभ ग्रह होने पर व्यक्ति को झूठ बोलने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती और धन की कमी भी नहीं आती। यह स्थिति जीवन में स्थिरता और संतोष दोनों प्रदान करती है।

वाणी की चतुराई और उसका परिणाम

कुछ लोग अपनी वाणी की चतुराई से दूसरों का उपयोग करते हैं। लेकिन जैसे ही आपको यह एहसास हो कि किसी ने आपकी वाणी का उपयोग करके आपको इस्तेमाल किया है, समझ लेना कि उसका राहु अब धड़ाका करने वाला है।

उसे कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। समय स्वयं उसे सब दिखा देगा। जो व्यक्ति झूठ बोलकर आपका समय बर्बाद करता है और आपको परखता रहता है, वह स्वयं धन के मामले में बहुत बड़ा धोखा खाता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।

धोखाधड़ी और उसका दण्ड

आजकल लोग चैक भरकर दे देते हैं, जबकि उनके अकाउंट में पैसा नहीं होता। सामने वाला उस चैक को कोर्ट में लगा देता है। परिणाम यह होता है कि उम्मीद से दुगना या तिगुना नुकसान उठाना पड़ता है।

यह केवल आर्थिक दण्ड नहीं होता, बल्कि मानसिक और सामाजिक कष्ट भी देता है।

राहु का प्रभाव और कर्मफल

ऐसा क्यों होता है इसका कारण द्वितीय भाव में राहु, केतु या नीच ग्रह होना है। यह पहले व्यक्ति से झूठ बुलवाता है, फिर उसी झूठ के कारण उसे दण्ड दिलवाता है।

राहु ने छल से अमृत पी लिया था, लेकिन वह उसे पचा नहीं पाया और उसका सिर कट गया। इसी प्रकार राहु झूठ तो बुलवा देता है, लेकिन सूर्य अर्थात सरकार उस झूठ को पकड़कर दण्ड दे देती है।

यह आँखों देखी बात है, केवल सिद्धांत नहीं।

एक वास्तविक उदाहरण और उसका गहरा संदेश

एक व्यक्ति की कुण्डली में द्वितीय भाव का नीच राहु था। उसने अपने भाई के साथ पैसे के मामले में सत्तर हजार रुपये की हेराफेरी की थी। यह बात पूरी तरह स्पष्ट थी।

उसके भाई को केवल इतना कहा गया कि इसका राहु चल रहा है, आठ महीने रुक जाओ।

चार से पांच महीने बाद उसके बेटे ने गाड़ी चलाते हुए स्कूटी पर जा रही एक लड़की को टक्कर मार दी। लड़की की टांग और पसलियाँ टूट गईं।

गाड़ी चलाने वाला लड़का पंद्रह से सोलह साल का था और बिना लाइसेंस के गाड़ी चला रहा था। जैसे ही घर में फोन आया, उस व्यक्ति के होश उड़ गए।

जब तक वह मौके पर पहुँचा, तब तक लड़की के माता पिता ने पुलिस में रिपोर्ट कर दी थी। लड़की ट्रॉमा वार्ड में भर्ती हो गई।

पुलिस के मामले में व्हीकल एक्ट का भी मामला बन गया। वह व्यक्ति लड़की के इलाज का पूरा खर्च उठाने के लिए तैयार हो गया।

इस पूरे मामले को सुलझाने में तीन से चार महीने लगे और लड़की की टांग ठीक होने में पाँच से आठ महीने लग गए।

जिसने केवल सत्तर हजार रुपये का नुकसान अपने भाई को पहुंचाया था, उसे चार से पाँच लाख रुपये तक देने पड़े।

निष्कर्ष और गहरा दार्शनिक अर्थ

वह चार से पाँच लाख रुपये पता नहीं कितनों से झूठ बोलकर कमाए गए थे। लेकिन जब वह पैसा गया, तो वह केवल आर्थिक हानि नहीं थी, बल्कि मानसिक रूप से बहुत अधिक दुःख देकर गया।

यही कर्म का नियम है कि झूठ से कमाया गया धन कभी शांति नहीं देता। वह समाप्त होता है, लेकिन अपने साथ पीड़ा, तनाव और पछतावा छोड़ जाता है।

इसलिए सत्य केवल नैतिकता नहीं है, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी सुरक्षा है।

ईश्वर सब कुछ पवित्र कर देता है

भगवान

ईश्वर सब कुछ पवित्र कर देता है यह एक गहरा आध्यात्मिक सत्य है। मनुष्य के भीतर मौजूद लालच, लोभ, मोह, काम और क्रोध सामान्यतः पतन के कारण माने जाते हैं, लेकिन जब यही भाव ईश्वर की ओर मुड़ जाते हैं, तो वही मुक्ति का मार्ग बन जाते हैं। वस्तु नहीं बदलती, केवल उसकी दिशा बदलती है और परिणाम पूरी तरह बदल जाता है।

मनुष्य का मन हमेशा किसी न किसी में लगा रहता है। यदि यह संसार में लगेगा तो बंधन बनेगा, और यदि ईश्वर में लगेगा तो वही भक्ति बन जाएगा। इसलिए संतों ने कहा है कि विकारों को दबाने की नहीं, बल्कि ईश्वर की ओर मोड़ने की आवश्यकता है

गीता का सिद्धांत

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्

अर्थात जो जिस भाव से मुझे भजता है, मैं उसे उसी प्रकार स्वीकार करता हूँ

यहाँ स्पष्ट है कि भाव चाहे जैसा भी हो, यदि वह ईश्वर की ओर है तो अंततः कल्याण ही करता है। गीता यह भी सिखाती है कि मनुष्य अपने स्वभाव से ही कर्म करता है, इसलिए उसे अपने स्वभाव को दबाने के बजाय उसे उच्च दिशा देनी चाहिए

रामचरितमानस का उदाहरण

रामचरितमानस में तुलसीदास जी कहते हैं

जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी

अर्थात मनुष्य जिस भाव से भगवान को देखता है, भगवान उसे उसी रूप में मिलते हैं

रावण और कंस इसका बड़ा उदाहरण हैं। उन्होंने भगवान से द्वेष और क्रोध रखा, लेकिन उनका मन हमेशा भगवान में ही लगा रहा। अंततः भगवान ने उनका भी उद्धार किया। इससे स्पष्ट होता है कि ईश्वर भाव के भूखे हैं, भाव की दिशा महत्वपूर्ण है

विकार से भक्ति तक

जब मनुष्य अपने विकारों को ईश्वर की ओर मोड़ देता है, तो अद्भुत परिवर्तन होता है।
लालच ईश्वर को पाने की लालसा बन जाता है।
मोह भगवान के चरणों में लग जाता है।
क्रोध अधर्म के विरुद्ध शक्ति बन जाता है।

यही आध्यात्म की सच्ची प्रक्रिया है। यह दमन नहीं, बल्कि परिवर्तन है।

निष्कर्ष

विकार स्वयं में दोष नहीं, उनकी दिशा दोष या गुण बनाती है।
यदि वही भाव संसार में लगते हैं तो बंधन बनते हैं, और यदि ईश्वर में लगते हैं तो मुक्ति का मार्ग बन जाते हैं।

इसलिए जीवन का सार यही है कि
अपने हर भाव को ईश्वर की ओर मोड़ दो, वही तुम्हारा कल्याण कर देगा।

श्रीमद्भागवत गीता : हर समस्या का समाधान

गीता

श्रीमद्भागवत गीता और प्रैक्टिकल अनुभव

लोग अक्सर इस डर से श्रीमद्भागवत गीता नहीं पढ़ते कि कहीं वे वैरागी न बन जाएँ।
लेकिन यह डर ही सबसे बड़ी गलतफहमी है।

वास्तविकता यह है कि जो व्यक्ति गीता को पढ़ने के साथ-साथ समझता है, उसके जीवन में समस्याओं का समाधान अत्यंत सरल और स्पष्ट होने लगता है।

गीता: हर समस्या का समाधान

ऐसी कोई भी समस्या नहीं है जिसका समाधान श्रीमद्भागवत गीता में न हो।

इस ग्रंथ में अनन्त भावार्थ छिपे हुए हैं।
हर बार पढ़ने पर नया अर्थ निकलता है और हर अर्थ आपके विचारों को शुद्ध करता है।

इसलिए गीता को केवल पढ़ना पर्याप्त नहीं है, उसे समझना आवश्यक है।

शब्द नहीं, अर्थ महत्वपूर्ण है

गीता के शब्द पढ़ने में समय नहीं लगता,
लेकिन उसके अर्थ को समझने में पूरा जीवन भी कम पड़ सकता है।

यह एक ऐसा ग्रंथ है जो केवल ज्ञान नहीं देता, बल्कि सोचने का तरीका बदल देता है।

समस्या का समाधान: एक सरल प्रयोग

जब भी जीवन में कोई उलझन आ जाए,
कोई रास्ता न दिखे —

तो शांत होकर गीता उठाकर बैठ जाइए।

अगर मन करे तो भगवान से प्रार्थना करें,
न करे तो बिना प्रार्थना भी पढ़ सकते हैं।

अपनी समस्या को मन में रखते हुए कोई भी पेज खोलिए।

अक्सर ऐसा अनुभव होता है कि सामने खुले पेज में ही उस समस्या का समाधान लिखा होता है।

यह कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि अनुभव से सिद्ध बात है।

व्याख्या का महत्व और सही पुस्तक का चयन

यदि आपको श्रीमद्भागवत गीता का सरल हिन्दी अनुवाद मिले, तो अवश्य खरीदें।

विशेष रूप से “गीता साधक संजीवनी” जैसी व्याख्याएँ अत्यंत गहराई से समझ प्रदान करती हैं।

इस प्रकार की पुस्तकों में केवल श्लोक नहीं, बल्कि उनके पीछे का दर्शन स्पष्ट होता है,
जिससे मन में चल रहा द्वंद्व जल्दी समाप्त हो जाता है।

एक वास्तविक अनुभव (क्लाइंट केस)

एक व्यक्ति अत्यधिक मानसिक उलझन में था।

उसे कहा गया कि वह अध्याय 2, श्लोक 7 पढ़े

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्

अर्थ समझने के बाद उसे कहा गया कि पुस्तक बंद कर के कोई भी पेज खोले।

जब उसने पेज खोला, तो जो सामने आया, वह उसकी समस्या का सीधा समाधान था।

यह अनुभव उसके लिए चमत्कार जैसा था।

जब प्रश्न गलत हो, उत्तर भी आईना बन जाता है

कुछ समय बाद उसने एक प्रश्न पूछा
“मेरे दुश्मन की मृत्यु कब होगी?”

फिर वही प्रक्रिया अपनाई गई।

जो पंक्तियाँ सामने आईं, उनका सार यह था
मनुष्य भगवान को छोड़कर बाहरी चीजों में उलझ जाता है,
और उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है।

यह सीधा उत्तर नहीं था,
लेकिन यह एक आईना था
जो उसकी सोच को दिखा रहा था।

गीता: आईना है, उत्तर नहीं

गीता हर प्रश्न का सीधा उत्तर नहीं देती,
बल्कि आपकी सोच को बदलकर उत्तर दिखाती है।

यदि कोई व्यक्ति गलत दृष्टिकोण से प्रश्न पूछेगा,
तो गीता उसे पहले उसकी गलती दिखाएगी।

ज्ञान बनाम अनुभव

गीता को पढ़कर केवल ज्ञान लेने वाला व्यक्ति,
अक्सर दूसरों को उपदेश देने लगता है।

लेकिन जो व्यक्ति समर्पण भाव से समझता है,
वह शांत हो जाता है और उसका व्यवहार बदल जाता है।

ज्ञान बोलता है,
अनुभव बदलता है।

कड़छी और पकवान का उदाहरण

जो व्यक्ति गीता को पढ़ता है लेकिन समझता नहीं,
वह उस कड़छी की तरह है जो स्वादिष्ट पकवान में डूबी रहती है
लेकिन कभी उसका स्वाद नहीं ले पाती।

कौन पढ़े गीता?

एक धारणा है कि केवल पुण्यात्मा ही गीता पढ़ सकता है।

लेकिन सत्य इसके बिल्कुल विपरीत है
जो गीता को पढ़ेगा और समझेगा, वही पुण्यात्मा बन जाएगा।

जीवन में उतारना ही असली ज्ञान है

यदि गीता पढ़कर जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आया,
तो वह केवल शब्दों का संग्रह बनकर रह जाती है।

लेकिन यदि उसके अर्थ को जीवन में उतार लिया जाए,
तो व्यक्ति निष्काम कर्मयोगी बन जाता है।

सफलता और गीता का संबंध

यदि आप किसी सफल व्यक्ति से उसकी सफलता का राज पूछेंगे,
तो वह 2-3 लाइनों में उत्तर देगा।

और आश्चर्य की बात यह है कि वही बात गीता में किसी न किसी रूप में पहले से लिखी होती है।

गीता पढ़ने से क्या मिलता है?

कई लोग पूछते हैं गीता पढ़ने से क्या मिलेगा?

उत्तर सीधा है
सिर्फ पढ़ने से कुछ नहीं मिलेगा।

लेकिन समझने और जीवन में उतारने से
सब कुछ मिल सकता है।

गलत उपयोग का परिणाम

इतिहास में ऐसे लोग भी रहे हैं जिन्होंने गीता पढ़ी,
लेकिन उसका गलत उपयोग किया।

इसलिए यह ग्रंथ नहीं,
बल्कि उसका उपयोग तय करता है कि परिणाम क्या होगा।

अंतिम निष्कर्ष

गीता कोई धार्मिक किताब मात्र नहीं है,
यह जीवन का मार्गदर्शन है।

जो इसे समझता है,
वह समस्याओं से भागता नहीं,
बल्कि उन्हें समझकर पार करता है।

जो इसे जीता है,
वह कर्म करता है लेकिन आसक्ति से मुक्त रहता है।

और अंततः
वही व्यक्ति सच्ची शांति को प्राप्त करता है।

इच्छा या जरूरत

इच्छा

इच्छा का अन्त नहीं है, लेकिन जरूरत पूरी हो जाती है। इच्छा पूरी होने पर दुःख का कारण भी बनती है।

गीता का संदेश

श्रीमद्भागवत गीता में कहा गया है -

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्र्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति।।

अध्याय 2 श्लोक 71

भावार्थ

जिस व्यक्ति ने इन्द्रियतृप्ति की समस्त इच्छाओं का परित्याग कर दिया है, जो इच्छाओं से रहित रहता है और जिसने सारी ममता त्याग दी है तथा अहंकार से रहित है, वही वास्तविक शान्ति प्राप्त कर सकता है।

जरूरत बनाम इच्छा का अंतर

भोजन आपकी जरूरत है, यह जरूरत पूरी हो जाएगी। लेकिन दुनिया की हर चीज खाना आपकी इच्छा हो सकती है, आवश्यक नहीं कि यह इच्छा पूरी हो जाए। आपको पैसा मिलता है और जरूरत पूरी हो जाती है तो अच्छा है, लेकिन जब पड़ोसी से ज्यादा पैसा पाने की इच्छा होती है तो मन और मस्तिष्क परेशान हो जाता है। पड़ोसी कुछ नहीं कर रहा, वह अपने गुण के अनुसार कमा रहा है। आपने उससे तुलना करके स्वयं के पैर पर कुल्हाड़ी मारी है, क्योंकि आपकी इच्छा जाग रही है ऊँचा उठने की। इसलिए अपनी जरूरत पूरी करें और इच्छा के रोग से बचें।

संतोष और असंतोष का अंतर

जरूरत पूरी होने पर संतोष मिल जाता है, लेकिन इच्छा क्या करती है, यह इन कहानियों से समझिए।

अल्लाहद्दीन का चिराग और जिन्न की कहानी

एक आदमी को अल्लाहद्दीन का जादुई चिराग मिल गया। उसने उसे रगड़ा तो उसमें से जिन्न निकल आया। जिन्न बोला कि मैं तुम्हारी तीन इच्छाएँ पूरी करूँगा, उसके बाद तुम्हारी जान ले लूँगा। आदमी ने कहा कि मुझे आज ही दस लाख रुपये चाहिए। जिन्न ने कहा कि शाम तक मिल जाएंगे।

शाम को एक व्यक्ति उसके घर आया और दरवाजा खटखटाया। दरवाजा खोलते ही उसने दस लाख रुपये से भरा बैग उसके हाथ में देते हुए कहा कि आपकी गाड़ी के नीचे आकर आपका बेटा मर गया। उसके बदले में यह रुपये देने आया हूँ। इतना सुनते ही वह आदमी बेहोश हो गया।

होश आने पर उसने जिन्न को बुलाया और दूसरी इच्छा जताई कि उसका बेटा उसे जीवित लौटा दिया जाए। जिन्न ने कहा कि शरीर बुरी तरह क्षत-विक्षत हो चुका है, इसलिए उसे जीवित करना कठिन है, लेकिन उसकी आत्मा को घर में ला सकता हूँ। थोड़ी ही देर में उसके बेटे की भटकती हुई आत्मा घर में आ गई, जो प्रेत बन चुकी थी। अब माता-पिता और अधिक परेशान हो गए। उन्होंने जिन्न से प्रार्थना की कि वह वहाँ से चला जाए। जिन्न चला गया, लेकिन कुछ समय बाद वापस आकर बोला कि तीनों इच्छाएँ पूरी हो चुकी हैं, अब तुम्हें मारना बाकी है। और उसने उन्हें मार दिया।

जीवन का कठोर सत्य

माता-पिता की मृत्यु जीवन का एक बड़ा सत्य है। एक लड़के ने भगवान से प्रार्थना की कि उसके माता-पिता जीवित रहें। भगवान ने उसकी इच्छा पूरी कर दी, लेकिन वह स्वयं अपने माता-पिता से पहले चल बसा। अब माता-पिता को जीवन भर अपने पुत्र की मृत्यु का दुःख सहना पड़ा।

हिमालय की जड़ी-बूटी की कहानी

एक सैनिक की ड्यूटी हिमालय क्षेत्र में लगी थी। वहाँ उसकी मुलाकात एक साधक से हुई, जिसने अपनी आयु आठ सौ वर्ष बताई। उसने बताया कि हिमालय में एक ऐसी जड़ी-बूटी है जिसे खाने से न बुढ़ापा आता है, न बीमारी और न मृत्यु। वर्ष में एक बार इसे लेना होता है, और जब मरने का मन हो तो इसे लेना बंद कर देना चाहिए।

सैनिक ने वह जड़ी-बूटी खाना शुरू कर दिया और हमेशा युवा बना रहा। उसकी पत्नियाँ बूढ़ी होती रहीं और वह नई शादियाँ करता गया। उसकी कई पीढ़ियाँ बढ़ती गईं, लेकिन उसकी जीवित रहने की इच्छा समाप्त नहीं हुई। सैकड़ों वर्षों बाद उसका विशाल परिवार फैल गया।

एक दिन जब वह जड़ी-बूटी लेने गया और लौटकर आया, तो उसने देखा कि एक मैदान में सैकड़ों शव जलाए जा रहे हैं। पास जाकर देखा तो वे सभी उसकी ही पीढ़ियों के लोग थे, जो एक महामारी में मर गए थे। यह दृश्य देखकर उसे गहरा सदमा लगा और वह इतना विचलित हो गया कि जड़ी-बूटी का ज्ञान ही भूल गया।

यदि वह सामान्य मृत्यु को स्वीकार करता, तो शायद इतना दुःख नहीं झेलता।

निष्कर्ष

इन सभी उदाहरणों से स्पष्ट है कि कुछ इच्छाएँ उचित होती हैं, लेकिन अनेक इच्छाएँ अनावश्यक और दुःख का कारण बनती हैं। इसलिए इच्छा से अधिक जरूरत को महत्व देना चाहिए।

भक्त प्रह्लाद ने भगवान से यही वर माँगा था कि उनकी सभी इच्छाएँ समाप्त हो जाएँ।

पाप कर्म ईश्वर कृपा में बाधक हैं।

कर्म

पाप कर्म ईश्वर के नजदीक नहीं आने देते, किसी न किसी तरह से दूरी बन जाती है।

विषय:- पापकर्म समाप्त होते ही ईश्वर कृपा की अनुभूति होती है।

ईश्वर के द्वार में लोगों की भीड़ लगी रहती है। उन्हें क्या मिलता है वहाँ घंटों तक पंक्ति में खड़े रहने से? क्यों लोग सैकड़ों किलोमीटर दूर से काँवड़ में गंगाजल भरकर ले जाते हैं? भगवान उन्हें क्या दे देता है?

ऐसे बहुत से सवाल उन लोगों के मन में आ जाते हैं जो लगभग नास्तिक प्रवृत्ति के होते हैं। नास्तिकता बुरी चीज नहीं है, नास्तिक लोग आँखों देखी चीजों पर विश्वास करते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण जी ने श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है कि मुझे चर्मचक्षुओं से नहीं देखा जा सकता है। मुझे देखने के लिए दिव्य दृष्टि की आवश्यकता है, जो तभी मिलती है जब मैं चाहता हूँ। मानव नेत्र से ईश्वर को देख पाना तभी संभव है जब ईश्वर स्वयं चाहें।

ईश्वर को देखने वाला व्यक्ति मछली में भी मत्स्यावतार की कल्पना कर लेता है और सूर्य को देखकर भी ईश्वर के साक्षात होने का प्रमाण मान लेता है। लेकिन जब तक ईश्वर नहीं चाहता, तब तक इस प्रकार के विचार भी मन में नहीं आ पाते।

कुछ लोग ईश्वर पर विश्वास करते हैं लेकिन फिर भी भगवान उन्हें नहीं सुनता है, ऐसा क्यों?

जब तक मनुष्य के पापकर्म समाप्त नहीं हो जाते, तब तक ईश्वर कृपा प्राप्त नहीं होती।

संत श्री तुलसीदास जी ने जब भगवान श्रीराम जी को ढूंढना चाहा, तो बाबूल के पेड़ पर लटके प्रेत ने कहा कि मैं तुम्हें भगवान राम से मिलने का रास्ता बताता हूँ।

प्रेत ने कहा, जहाँ भी श्रीराम कथा होती है, वहाँ सबसे पहले हनुमान जी आते हैं और सबसे बाद में जाते हैं। उनके चरण पकड़ लेना और कहना कि भगवान श्रीराम जी के दर्शन करवा दो। हनुमान जी दर्शन करवा देंगे।

तुलसीदास जी ने कहा कि ओ भले मानस, तुझे इतना ही ज्ञान है राम जी के दर्शन का, तो खुद दर्शन क्यों नहीं कर लेता?

प्रेत ने कहा , मैं पापकर्मों के कारण प्रेत बनकर भटक रहा हूँ। जब पापकर्म समाप्त होंगे, तब सबसे पहले हनुमान जी की शरण में जाऊँगा, श्रीराम जी के दर्शन करूंगा। लेकिन जब तक पापकर्म हैं, मैं ईश्वर के पास नहीं जा सकता। ये पापकर्म मेरे हैं, ईश्वर के नहीं।

इसी प्रकार एक ईश्वर भक्त मंदिर जाता था। अक्सर उसकी बारी आने पर प्रसाद समाप्त हो जाता था।

एक दिन वह दुखी होकर पुजारी से बोला कि आप प्रसाद थोड़ा अधिक बनाया करो। मैं मंदिर आता हूँ लेकिन मुझे मिलने से पहले ही प्रसाद समाप्त हो जाता है।

पुजारी ने अगले दिन अधिक प्रसाद बनाया, लेकिन उस व्यक्ति की बारी आने से पहले ही प्रसाद समाप्त हो गया। ऐसा कई दिन तक चलता रहा।

एक दिन वह व्यक्ति बोला, भगवान, तुम ऐसा क्यों करते हो? मैं आप पर बड़ी श्रद्धा रखता हूँ, फिर प्रसाद नसीब में क्यों नहीं है?

रात को उसे स्वप्न में भगवान ने दर्शन दिए और कहा,
जब तक तुम्हारे पापकर्म समाप्त नहीं हो जाते, तब तक किसी न किसी रूप में तुम्हें मेरी कृपा प्राप्त होने में रुकावट आती रहेगी।

पाप अधिक है तो प्रसाद भी नसीब नहीं होता। तुम्हें दर्शन हो रहे हैं, वही बड़ी बात है।

जो मंदिर जाते हैं, काँवड़ में जल उठाकर सैकड़ों किलोमीटर दूर जाकर शिवजी का अभिषेक करवाते हैं, वे इसलिए करवाते हैं क्योंकि उन्होंने ईश्वर को महसूस किया है।

वह एहसास ही उन्हें सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने की शक्ति देता है।

संकट के समय ईश्वर आपको सहारा देकर फिर बेसहारा क्यों कर देता है?

कर्मफल

कर्मफल

कर्म प्रधान विश्व रची राखा,
जो जस करहि,
सो तस फल चाखा।

संकट के समय ईश्वर आपको सहारा देकर फिर बेसहारा क्यों कर देता है?

विषय:- आज नहीं तो कल, कर्मफल मिल के रहेगा।

संकट के समय में ईश्वर आपको सहारा देकर फिर बेसहारा कर देता है तो इसका अर्थ ये नहीं कि ईश्वर बेरहम है।

गरीबी में भटकना पड़ा, लेकिन दूसरे पक्ष में सुदामा की भगवान के प्रति श्रद्धा और भक्ति भी थी, जिसके फलस्वरूप बाद में सुदामा महलों में रहने लगा था।

शास्त्रों में कहा है -

अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।
नाभुक्तं क्षीयते कर्म जन्म कोटिशतैरपि॥

अर्थ - शुभ और अशुभ कर्मों का फल भुगतना ही पड़ता है। अगर अभी कर्मफल नहीं भुगता तो कर्मफल करोड़ों सैंकड़ों जन्मों तक भी क्षीण नहीं होगा।

एक कहानी

किसी गांव में एक सिपाही को खजाने की पहरेदारी का काम दिया गया था। खजाने को देखकर उसकी नियत खराब हो गई। उसने एक थैले में कुछ सोना भरा और अपने घर चल दिया।

रास्ते में एक व्यक्ति ने उसे देखा और कहा कि भाई तुम पहरेदार होकर खजाने की चोरी कर रहे हो। सिपाही ने कहा कि तुम थोड़ा बहुत सोना ले लो और मुझे जाने दो।

उस व्यक्ति ने सोना लेने से इनकार कर दिया। सिपाही ने सीटी बजाकर लोगों को इकट्ठा किया और कहा कि यह व्यक्ति खजाने से सोना चोरी करके भाग रहा है। उस व्यक्ति को झूठे मुकदमे में फंसा दिया गया।

राज दरबार में उसे फांसी की सजा सुनाई गई। वह व्यक्ति गिड़गिड़ाता रहा कि मैं निर्दोष हूं, मुझे फंसाया गया है।

राजा ने सिपाही से कहा कि इसे दूसरे कमरे में ले जाओ और कुछ देर इंतजार करो। दूसरे कमरे में एक लाश रखी गई थी। वहां सिपाही और वह व्यक्ति बैठ गए।

सिपाही ने कहा कि मैंने तुझे पहले ही कहा था कि थोड़ा सोना ले ले और मुझे जाने दे, लेकिन तू नहीं माना, इसलिए आज यह सजा भुगत रहा है।

तभी राजा वहां छिपकर सब सुन रहा था। राजा ने सिपाही की सच्चाई जान ली और सिपाही को दंडित किया।

बाद में जांच में पता चला कि जिस व्यक्ति को फांसी दी जा रही थी, उसने कई साल पहले एक व्यक्ति की हत्या की थी, लेकिन पकड़ा नहीं गया था।

राजा ने कहा कि यह सजा तुम्हें उसी कर्म का फल है, चाहे कारण कुछ भी दिखाई दे।

दूसरी घटना (वैज्ञानिक उदाहरण)

एक मित्र का समय बहुत खराब चल रहा था। व्यवसाय में जब भी नुकसान होने लगता, अचानक पैसा आ जाता, लेकिन कुछ ही दिनों में फिर खत्म हो जाता।

उसने पूछा ऐसा क्यों होता है।

उसे एक वैज्ञानिक का उदाहरण बताया गया।

वैज्ञानिक ने एक चूहे को पानी में डाला। लगभग डेढ़ घंटे बाद वह चूहा मर गया।

फिर उसने दूसरे चूहे को पानी में डाला। जब वह मरने ही वाला था, तो उसे निकालकर कुछ देर आराम दिया और फिर वापस पानी में डाल दिया।

इस बार चूहा लगभग 60 घंटे तक जिंदा रहा।

कारण यह था कि उसे आशा मिल गई थी कि कोई उसे बचा सकता है।

इसी प्रकार जब हमारा समय खराब होता है तो ईश्वर कुछ समय के लिए हमारी मदद करता है और फिर हमें उसी स्थिति में छोड़ देता है, ताकि हम उम्मीद न खोएं और संघर्ष करते रहें।

सुदामा का प्रसंग

सुदामा भगवान कृष्ण के मित्र थे, लेकिन उनका जीवन गरीबी में बीता। यह उनके पूर्व कर्मों का परिणाम था।

जब उनके कर्म समाप्त हुए, तब भगवान कृष्ण ने उन्हें सम्मान और समृद्धि दी।

अंतिम निष्कर्ष

यदि आज हम बिना कारण दुःख झेल रहे हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि ईश्वर हमारे साथ अन्याय कर रहा है।

यह हमारे कर्मों का परिणाम है।

यदि अभी नहीं भुगता तो भविष्य में भुगतना ही पड़ेगा।

कर्मफल से कोई बच नहीं सकता।

कर्मफल अकाट्य है।

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कर्म इंसान के अधिकार में है, उसका फल देना ईश्वर के अधिकार में है।

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विषय:- कर्म प्रधान विश्व रची राखा।

जैसा कर्म करेंगे, वैसा फल मिलेगा।

शुद्ध रूप से सोच समझ कर निर्णय किया लेकिन फिर भी सीता का हरण हुआ, दशरथ की मृत्यु हुई और वनवास भोगना पड़ा। सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र ने हमेशा सत्य कहा लेकिन फिर भी नीच कलर डोम के हाथों बिके, मुर्दे जलाए तथा उसके घर में नौकर बनकर पानी भरा। राजा बनने के लिए अपने पुण्य कर्मों का सारा दान कर दिया लेकिन अंत में पाताल की प्राप्ति हुई। राजा नृग ने 1 करोड़ गायें दान कर दीं जिनमें गलती से एक ब्राह्मण की गाय दूसरे को दे दी। जब ब्राह्मण ने दूसरे ब्राह्मण के पास अपनी गाय पहचानी तो राजा ने मिलना चाहा कि आपने गलती से मेरी गाय ले ली है और बदले में दान कर दी। राजा ने तीनों के चरण पकड़कर क्षमा मांगी, लेकिन ब्राह्मण ने शाप देकर राजा को गिरगिट बना दिया। 1 करोड़ गायों का दान भी काम नहीं आया और राजा को गिरगिट बनना पड़ा।

पाण्डवों के मित्र, सारथी थे भगवान कृष्ण, लेकिन उन्हें भी पत्नी का अपमान झेलना पड़ा, राज्य खोया, वनवास गए, गुरु, दादा, पाण्डव द्रोपदी समेत युद्ध में गिरकर मरे। भगवान श्रीकृष्ण ने पाण्डवों के पापों के उद्धार के लिए घमण्ड चूर करवाया, लेकिन फिर भी भगवान श्रीकृष्ण का सारा वंश समाप्त हो गया। सूर्य देव और चन्द्रमा तक ग्रहण लगते हैं। इसे न रोका जा सकता है और न बदला जा सकता है।

कबीर ने कहा है कि कर्म की गति को कोई नहीं बदल सकता, कर्म के फल मिलकर ही रहते हैं और होते ही रहेंगे।

मण्डी, हिमाचल प्रदेश

कर्म प्रधान विश्व रची राखा।
जस जस भाव कर्म करैंगा,
तस तस भाव कर्मफल चाखा।।

लोगों के मन में गलतफहमी रहती है कि एस्ट्रोलॉजर कुछ हद तक बदल सकता है, जबकि सत्य कुछ और ही होता है। आपके खराब वक्त में आप कोई भी उपाय कर लीजिए, आपको तकलीफ होनी ही है। संसार में जो भी मनुष्य पैदा हुआ है उसे अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। कोई कितना भाग सकता है? जब तक कर्म भोग कर खत्म नहीं हो जाता तब तक कोई इससे नहीं बच सकता। चाहे आप कितना ही बड़ा उपाय या अनुष्ठान क्यों न कर लें।

कबीर ने कहा -

कर्म गति टारे नहीं टरी।
मुनि वशिष्ठ से पंडित ज्ञानी,
शोध के लान धरी।
सीता हरण, मरन दशरथ को,
वन में विपत्ति पड़ी।
नीच घर नीर भरावन हरिचंद,
बली पाताल धरी।
कोटि गाय नित पुण्य करत,
नृग गिरगिट जोन परी।
पाण्डव जिनके आप सारथी,
तिन पर विपत पड़ी।
दुर्योधन का गर्व घटायो,
यदुकुल नाश करी।
राहु केतु भानु चन्द्रमा,
विधि संजोग परी।
कहत कबीर सुनो रे भाई साधो,
होनी हो के रही।

अर्थ -

कर्म की गति चाह कर भी नहीं टाली जा सकती। श्रेष्ठ मुनि वशिष्ठ ने भगवान श्री राम और सीता का विवाह लग्न बहुत शुभ देखा, फिर भी सीता का हरण हुआ और दशरथ की मृत्यु हुई। सत्यवादी हरिश्चन्द्र को नीच घर में पानी भरना पड़ा। राजा बलि पाताल गए। राजा नृग को गिरगिट बनना पड़ा। पाण्डवों को कष्ट सहना पड़ा। दुर्योधन का गर्व टूटा और यदुवंश समाप्त हुआ। सूर्य और चन्द्रमा तक ग्रहण लगते हैं।

मीराबाई ने कहा -

कर्म गति टारे नहीं टरी।
सतवादी हरिचंद से राजा,
नीच घर नीर भरी।
पाँच पाण्डव अरु सती द्रौपदी,
हाड़ हिमालय भरी।
दुर्जन जनम लिया इन्द्रासन,
सूर पाताल धरी।

तुलसीदास जी का कथन -

विश्व कर्म प्रधान है और जिस भावना से कर्म किया जाता है उसी प्रकार फल मिलता है।

अंतिम विचार

अपने पूर्व जन्म के अच्छे-बुरे कर्मों को हम नहीं जानते हैं। जब हमें बुरे कर्मों का फल मिलता है तो ऐसी स्थिति होती है जैसे कि गरम रोटी गले में फंस जाती है। न उसे उगल सकते हैं और न निगल सकते हैं।

लेकिन यदि हम भगवान का नाम लेते हैं तो वह कष्ट कम हो सकता है। कर्मफल का बोझ तो उठाना ही पड़ेगा—चाहे समझ कर उठाएँ या रोकर उठाएँ।

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किस्मत को बदलने का सबसे सरल और प्रभावी तरीका है—अपने कर्मों को बदलना।